न हारा है इश्क़ न दुनिया
थकी है
ज़नाब मोहम्मद हैदर ख़ान | आप भी सोच रहे होंगे कि भला ये
शख्सियत कौन हैं | मैं इनका ज़िक्र क्यों कर रहा हूँ जबकि नाम भी सुना-सुना सा नही लगता
| चलो मैं ज्यादा ख़ुफ़ियापंती नहीं करता हूँ आपको बताए देता हूँ इस अज़ीम शख्सियत के
बारे में | इन्हें आप "ख़ुमार बाराबंकवी" के नाम से भी जानते हैं | ख़ुमार
उनका तख़ल्लुस था | उर्दू के जाने माने शायर कुंवर मोहिंदर सिंह बेदी "सहर"
ने ख़ुमार साहब की मौज़ूदगी में एक बार कहा था कि इनका तख़ल्लुस इनकी शायरी से बिलकुल
भी मेल नहीं खाता | दरअसल इनका तख़ल्लुस ख़ुमार नहीं सुरूर होना चाहिए क्योंकि ख़ुमार
उस नशे को कहते हैं जो उतर रहा हो जबकि ख़ुमार साहब की शायरी उभरते हुए नशे की तरह है
जिसे सुरूर कहते है | ख़ुमार साहब को उनके बेहद करीबी लोग दुल्लन कहकर भी बुलाते थे
|

15 सितम्बर 1919 को बाराबंकी के कटरा-पीरबटावन मोहल्ले में जन्मे
ख़ुमार साहब को शेरो-शायरी का हुनर विरासत में मिला | ख़ुमार साहब के वालिद जनाब डॉ.
ग़ुलाम हैदर सलामस और मर्सिया वगैरह अपने तख़ल्लुस "बहार" के नाम से लिखा
करते थे | इनके चचा "करार बाराबंकवी" ख़ुद एक मकबूल शायर थे और इन्होंने
ही ख़ुमार साहब को शेरो-शायरी की बारीकियों से वाकिफ़ कराया | इनके भाई काज़मी हैदर
"निगार" भी एक शायर थे | तो कुल मिलकर लब्बोलबाब ये है कि शायरी ख़ुमार
साहब के ख़ून में दौड़ती थी |
ख़ुमार साहब एक शायर होने के आलावा एक अच्छे तालिब भी थे लेकिन जब
वो इंटरमीडिएट करने के लिए लखनऊ आये तो एक ख़ूबसूरत मोड़ ने इन्हें पढ़ाई छोड़ने पर
मज़बूर कर दिया और यहीं से उनकी शायरी ने एक नया सफ़र तय करना शुरू किया जो हर रोज़
एक नयी बुलंदियों को छूने लगा |
ख़ुमार साहब की शायरी का हर कोई कायल था तो भला मैं कैसे बच सकता था
| उन दिनों इन्टरनेट यूट्यूब का चलन नहीं था | हम लोग ऑडियो कैस्सेट्स पर उनकी
शायरी और ग़ज़लें सुना करते थे या फ़िर आमने-सामने मुशायरे में | मैंने पहली बार उनको
बाराबंकी में होने वाले देवां मेले में सुना | क्या मतले थे, क्या शेर थे और और
क्या ग़ज़ल थी | एक-एक शेर जैसे करीने के साथ तराशा गया हो | उनके हर एक शेर से इश्क़
और मोहब्बत की शबनम टपक रही थी | उनकी शेरो-शायरी तो बेहतरीन थी ही और साथ ही उनकी
आवाज़ और तरन्नुम भी अव्वल दर्ज़े का था | कहते हैं, इश्क़ पर मीर और दाग़ से बेहतर
किसी और ने नहीं लिखा (और भी हो सकते हैं जो मेरी नज़र में नहीं हैं, जिगर उनके
समकालीन थे इसलिए उनका ज़िक्र यहाँ नहीं कर रहा हूँ) लेकिन इन दोनों की शायरी आम
लोगों की समझ के बाहर थी क्योंकि वो बहुत कठिन लब्जों का इस्तेमाल किया करते थे जबकि
ख़ुमार साहब की शायरी आम लोगों की चलतुआ ज़बान में थी इसलिए उसकी पहुँच बहुत दूर तक
हुई और ऊपर से जानलेवा तरन्नुम और हर मिसरे के बाद आदाब कहने की उनकी अदा उन्हें दूसरे
शायरों से मुख्तलिफ़ करती थी |
ख़ुमार ने अपना पहला मुशायरा 1938 में बरेली में पढ़ा | उनका पहला
शेर “वाकिफ नहीं तुम अपनी निगाहों के असर से, इस राज को पूछो किसी बरबाद नजर से”
था | इसके बाद, ढाई वर्ष के दौरान में ही वे पूरे मुल्क में मशहूर हो गये | उस दौर
में जिगर मुरादाबादी अव्वल दर्ज़े के शायर माने जाते थे चूंकि ख़ुमार साहब ने
तरन्नुम से शुरूआत की इसलिए बहुत जल्द ही वे जिगर मुरादाबादी के करीब पहुँच गये |
मुशायरों में अगर मजरूह सुलतानपुरी साहब के बाद अगर किसी को तवज्जो दी जाती थी तो
वो "ख़ुमार साहब" ही थे |
एक रोज़ मैं ख़ुमार साहब की गज़लें सुन रहा था तभी एक साहब आए और कहने
लगे, "ये तो कुमार बाराबंकी (ख़ुमार बाराबंकवी) की आवाज़ है | मैंने कहा,
"जी हाँ वहीँ हैं" | वो साहब कहने लगे, “अरे इनको तो मैं बहुत अच्छे से
जानता हूँ, यदाकदा ट्रेन में मिलते रहते हैं | कोई शायर-वायर हैं | ट्रेन में भी
शेरो-शायरी सुनाते रहते हैं | किसी को मना नहीं करते, बस पान की गिलौरियाँ खिलाते
रहो और शेरो-शायरी सुनते रहो” |
आप इस बात से दो अंदाज़े लगा सकते हैं, एक, उन साहब को ये बिलकुल भी
इल्म नहीं था कि वो कितने बड़े शायर हैं और दूसरा ख़ुमार साहब ने किसी को ये अंदाजा
लगाने का मौका ही नहीं दिया कि वो कितने बड़े शायर हैं | इससे एक बात और बज़ाहिर
होती है कि वो एक बड़े शायर होने के साथ-साथ एक बेहतरीन शाख्सियत के मालिक भी थे | वैसे
तो ख़ुमार साहब ने तमाम फ़िल्मों के लिये गीत-ग़ज़लें लिखी लेकिन फ़िल्म
"बारादरी" के लिये 1955 में लिखा गया उनका नग्मा "तस्वीर बनाता
हूँ, तस्वीर नहीं बनती" कुंदन लाल सहगल की आवाज़ में आज भी लोगों के दिलों में
ताज़ा-तरीन हैं | उन्होंने तमाम फिल्मों को अपने नग्में-गज़लें दी और तमाम बुलंदियों
को हासिल किया लेकिन इसके बावज़ूद भी उन्होंने अपनी नज़रें ज़मीन की तरफ ही रक्खीं | हर
कोई उनसे बात कर सकता था, मिल सकता था और वो सबके लिए हाज़िर थे |
मैंने उन साहब से गुज़ारिश की, “एक बार मुझे भी ख़ुमार साहब से
मिलवायें” | वो बोले, “हाँ-हाँ ज़रूर, इसमें कौन सी बड़ी बात है, बहुत ही धांसू शख्श
हैं, कटरा-पीरबटावन में रहते हैं, अब की बार मिलेगें तो कह देंगे की घर पर मिलना
है, फिर चले चलेंगे” हालांकि मुझे पता था ये मेरे लिए कितनी बड़ी बात है | अब इसे
इत्तेफाक कहें या मेरी ख़ुशनसीबी | वर्ष मुझे ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन फ़िर भी ये बात
होगी क़रीब बरस 1995-1996 की | ख़ुमार साहब किसी मुशायरे की लिए बांद्रा ट्रेन से
कहीं जा रहे थे | उस दिन मैं भी बाराबंकी से लखनऊ उसी ट्रेन से जा रहा था उन्हीं
साहब के साथ जिन्हें मुझे ख़ुमार साहब से मिलवाने का वादा किया था | उस दिन ट्रेन
के आने में कुछ वक़्त था इसलिए हम दोनों बाराबंकी स्टेशन पर चाय पीने लगे | तभी उन
साहब ने अचानक कहा, "लो तुम्हारी मुराद पूरी हुई" | मैं ख़बर से अनजान,
“कौन सी मुराद ”? “अरे कुमार बाराबंकी से नहीं मिलना है” ? “कहाँ”? “वो क्या रहे” |
मेरी तो ख़ुशी का तो जैसे ठिकाना न रहा कि मैं ख़ुमार साहब से रूबरू होने वाला हूँ तभी
मरदुआ ट्रेन आ धमकी |
हम और वो साहब बिजली की रफ़्तार से उसी डिब्बे की तरफ लपके जिधर
ख़ुमार साहब जा रहे थे | हम उनके पीछे-पीछे उनकी सीट के सामने वाली सीट पर बैठ गए |
उन साहब ने ख़ुमार साहब को आदाब-अर्ज़ किया और ख़ुमार साहब ने उन्हें | उन साहब ने
मेरा भी तार्रुफ़ ख़ुमार साहब से करवाया | ख़ुमार साहब मुस्कुराये और बोले, “बेटा
क्या करते हो” | मैंने कहा, “जी ग्रेजुएशन कर रहा हूँ लखनऊ यूनिवर्सिटी से” | बोले,
“बहुत बढ़िया” | मैंने कहा, “ख़ुमार साहब, मैंने आपको एक बार देवां मेले में सुना था
और अब आपको ऑडियो कैसेट पर सुनता हूँ | आप बहुत ही बेहतरीन लिखते हैं | मैं तो
कायल हूँ आपकी शायरी का” | ख़ुमार साहब कहने लगे, “मैं कहाँ लिखता हूँ, ये सब अल्ला-मियाँ
की मेहरबानी है और आप लोगों की मोहब्बत है वरना मैं किस क़ाबिल हूँ” | मैंने ख़ुमार
साहब से बिना इज़ाज़त लिए एक सवाल किया, “आपने फ़िल्मों कुछ गाने भी लिखे लेकिन फिर
बीच में छोड़कर क्यों चले आये” तो उन्होंने अपना ज़वाब इस शेर से दिया, “कोई धोका न
खा जाए मेरी तरह, ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिए” / “अक्ल-ओ-दिल अपनी-अपनी कहें जब
‘ख़ुमार’, अक्ल की सुनिए, दिल का कहा कीजिये” और फ़िर कहने लगे बेटा, “लिखता जभी हूँ
जब ऊपर वाला दिल से रूबरू होता है जबकि फ़िल्मों में ज़रुरत के हिसाब से लिखना पड़ता
है जो मुझसे नहीं हो पाया” | भला हो नौशाद साहब का जिन्होंने मुझे फिल्मों में मौका
दिया लेकिन मुझे मुशायरे ही मुबारक | कुछ देर तक ख़ुमार साहब से बात होती रही | वो
पान की तही गिलौरियाँ खाते रहे और शेर सुनाते रहे | उस दिन हमारा वक़्त ऐसे गुज़रा कि
पता ही नहीं चला और हमारा स्टेशन आ गया | हमारी मुलाक़ात बहुत छोटी थी लेकिन ख़ुमार
साहब से मिलकर ऐसा लगा जैसे मैं उन्हें बरसों से जानता हूँ | इतना बड़ा शख्स और
इतना आसान, यकीन नहीं हो रहा था |
ख़ुमार साहब, उन शोरा में से थे जो ग़ज़ल के उसी शर्मीले, लज़ीले और
रसीले अंदाज़ के रसिया थे जिसे हम क्लासिकी ग़ज़ल कहते हैं | तरक्की पसंद तहरीक़
सरबुलंदियों के वक़्त जब ग़ज़ल पर बड़ा कड़ा वक़्त था तब भी उन्होंने हसरत और जिगर की
तरह ग़ज़ल का दामन नहीं छोड़ा और अपने आप को इस ख़ूबसूरत सी शायरी का निगेहबान साबित
किया | वो अपने मुनफ़रीद अशआर और ख़ूबसूरत तरन्नुम के साथ मुशायरों को लूट लिया करते
थे | उनकी शायरी में वो जादू था कि लोग घंटो तक उन्हें उठने ही नहीं दिया करते थे
|
एक बार एक मुशायरे के सिलसिले में ख़ुमार साहब अमेरिका गए तो वहाँ
के एक रिपोर्टर ने पूछा, "आपका इस देश के बारे में क्या ख़्याल है" ? तो ख़ुमार
साहब ने बड़े तपाक से कहा, "मैं गलत उम्र में सही जगह आ गया हूँ" ऐसी
ज़िंदादिल शख्शियत के मालिक थे, ख़ुमार साहब |
ख़ुमार साहब ने चार किताबें भी लिखीं, “शब-ए-ताब”, “हदीस-ए-दीगर”, “आतिश-ए-तर”
और “रख्स-ए- मय” है | ख़ुमार साहब का आख़िरी वक़्त बहुत अच्छा नहीं रहा और एक साल की
लंबी बीमारी के बाद 19 फरवरी 1999 की रात उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया |
उन्होंने उर्दू अदब और शायरी में वो जगह छोड़ी जिसे अब तक भरा नहीं जा सका है और
शायद वो कभी नहीं भरेगा |
ख़ुमार साहब ने एक से बढ़कर एक ग़ज़लें लिखीं और उन्हीं में से एक ग़ज़ल के
कुछ चंद अशआर आपके पेश-ए-ख़िदमत है;
न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है, दिया जल रहा है हवा चल रही है
सुकू ही सुकू है खुशी ही खुशी है, तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है
वो मौज़ूद है और उनकी कमी है, मुहब्बत भी तहाई-ए-दायमी है
खटक गुदगुदगी का मज़ा दे रही है, जिसे इश्क कहते है शायद यही है..
ये लेख 19 फरवरी 2017 को Havabaazi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं |
http://havabaazi.com/kisson-ki-potli/naa-hara-hai-ishq-na-duniya-thaki-hai/