शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

क्रेमलिन से लाल झंडा तो उतार दिया, लेकिन उसके आगे..?


26 दिसम्बर 1991 को हंसिया-हथौड़े के साथ सुर्ख़ लाल झंडा मास्को में ऐतिहासिक क्रेमलिन से उतारा जा रहा था | वो भीषण सर्दियों के दिन थे जब दुनिया की पहली समाज़वादी सरकार सर्वहारा आंदोलन की ज़मीन पर प्रतिक्रांति के सामने अपने घुटने टेक रही थी वहीँ दूसरी तरफ दुनिया के किसान और मज़दूर जमातों की धड़कने कुछ देर के लिए थम सी गयीं थीं और वो इस विघटन से हुए नुकसान की भयावहता को मापने में लग गयीं थीं |

इस घटना से ठीक चार दिन पहले यानी 22 दिसम्बर 1991 को सोवियत संघ के तीन सबसे बड़े सूबों ने सोवियत संघ के विघटन का फैसला कर लिया था जबकि सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी को उसी वर्ष की गर्मियों में भंग कर दिया गया था |

सोवियत संघ का विघटन उस प्रतिक्रांति प्रयास का नतीजा था जिसकी शुरआत वर्ष 1985 में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की पुनर्गठन की प्रक्रिया के साथ शुरू हो गयी थी और वर्ष 1989 आते-आते अपने चरम पर पहुँच गयी | और इसका परिणाम यह हुआ कि सोवियत संघ से समाज़वाद का खात्मा हो गया हालांकि ऐसा कोई एक दिन में नहीं हुआ था | प्रतिक्रांति की जड़ें तभी से मज़बूत होने लगीं थी जब 1956 से संशोधनवादी और अवसरवादी फैसले लिए जाने लगे थे जिसके पीछे सिर्फ और सिर्फ पूँजीवाद की ताकतें लगीं हुईं थीं |

सन 1991 के बाद बोल्शेविक आंदोलन से बनी सोवियत संघ की समाजवादी ज़मीन पूंजीवादियों के हांथों लूट के उपलब्ध हो गयी जो अभिजात्य वर्ग की नुमांइदगी कर रहे थे | उसी साल मार्च में सोवियत संघ में एक जनमत भी कराया गया था जिसमे लगभग 76% लोगों ने सोवियत संघ की समाज़वादी सरकार और संघ के बने रहने के पक्ष में वोट दिया था हालांकि प्रतिक्रांति आंदोलन नें जान बूझकर इसे नज़रअंदाज़ कर दिया जो उनकी पूंजीवादी मानसिकता और मंसूबों को साफ़-साफ़ दर्शाता था |

सोवियत संघ टूटने के दर्द को उस वक़्त एक ग्रीस कम्युनिस्ट अखबार नें कुछ इस तरह लिखा था - The Soviet red flag is no longer waving in the domes of the Kremlin. Its lowering sealed with a dramatic and symbolical way the end of the 74 year old course of the first socialist state in the world. For a moment the clocks indicators remained motionless, marking the critical moment. The hearts of many million workers in all over there world stopped beating, weighting the magnitude of the losses.

सोवियत संघ की विशाल सामाजिक उपलब्धियों को नयी पूंजीवादी सरकार नें अपने भ्रामक वादों के दम पर धराशायी कर दिया था | नयी सरकार ने लोगो को भरोसा दिलाया था कि रुसी लोगो को और अधिक लोकतंत्र, अधिक सामाजिक स्वतंत्रता और एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था मिलेगी जो लोगों की ज़िन्दगी में क्रांतिकारी बदलाव लेकर आएगी जबकि इस बात का उस समय तक और आज के समय में भी कोई सबूत नहीं मिलता हैं बल्कि उल्टा दुनिया में मुक्त बाज़ार व्यवस्थाएं ध्वस्त होती दिखाई दे रहीं हैं |

विघटन के बाद नयी पूंजीवादी सरकार नें इस बदलाव को "शॉक थेरेपी" का नाम दिया था और आर्थिक उदारीकरण की कई नीतियों को रातों रात लागू कर दिया, जिसके रुसी लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर कई नकारात्मक प्रभाव हुए | मसलन सामाजिक और आर्थिक असमानताओं में तेजी से वृद्धि होने लगी, समाजवादी कल्याणकारी राज्य का विनाश हो गया, श्रमिक वर्गों के सामाजिक अधिकार कम हो गए और गरीबी चरम पर पहुँच गयी |
सोवियत संघ में हुए प्रतिक्रांति से आज 25 साल बाद भी अधिकतर रुसी लोग ख़ास तौर पर बूढ़े लोग सोचतें है कि सोवियत संघ की सामाजवादी सरकार के समय सामजिक और आर्थिक स्थिति बहुत बेहतर थी | लोग ये भी मानतें है कि पूंजीवादी रुसी सरकार सार्वजनिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में विफल रही है और समाज के कुछ ख़ास वर्गों तक ही लाभ पहुँचा है |

मार्च 2016 में एक सर्वे कराया गया जिसमें ये निकलकर आया कि अगर आज सोवियत संघ के पक्ष में वोट कराया जाए तो 64% लोग इसके पक्ष में वोट करेंगे और उन लोगों ने उस समय के सोवियत संघ विघटन पर खेद भी व्यक्त किया | मार्च 2013 में एक और पब्लिक सर्वे कराया गया जिसमें 60% लोगों नें माना कि सोवियत संघ में ज़िन्दगी नकारात्मक पहलुओं की तुलना में अधिक सकारात्मक थी |

कुछ इसी तरह कि सोच सोवियत संघ से अलग हुए दूसरें देशों में भी सामने आयी, जहाँ देश की नीतियां समाज के कुछ ख़ास लोगों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से बनायीं गयी और बनायीं जा रहीं हैं और मज़दूर-किसान की बात कहीं पीछे छूटती जा रही है |

आज बड़ा सवाल ये है कि आर्थिक उदारीकरण और राष्ट्रवाद के नाम पर समाज और देश को आगे ले जाने का दावा करने वाला अभिजात्य और पूंजीवादी वर्ग हर जगह नाकाम रहा ? और अगर नाकाम रहा तो क्या समाजवाद ही समाज की बेहतरी का जवाब है ? और क्या वैसा जैसा सोवियत संघ के समय में था या इसे कुछ बदलावों के साथ आना चाहिए ? 

ये लेख 17 जनवरी 2017 को thelallantop.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 
http://www.thelallantop.com/bherant/fall-of-socialism-in-ussr-written-by-ashish-mishra/

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

वो बेवफ़ा न था यूं ही बदनाम हो गया

1857 की ग़दर में न जाने कितने लोगों ने अपनी सहादत दी | कुछ लोगों के नाम इतिहास में दर्ज हुए और कुछ हमेशा के लिए गुमनाम हो गए | ग़दर का अगर इतिहास उठाकर देखें तो हमें ये इल्म हो जायेगा कि ब्रितानिया हुकूमत ने ग़दर को निस्ते नाबूत करने के लिए आज़ादी के परवानो को बड़ी ही बेरहमी से क़त्ल किया और जो क़त्ल किये गए उनमें हर मज़हब और जाति के लोग थे | 


हिन्दुस्तान राष्ट्र बनने की असल अवधारणा 1857 की ग़दर के साथ शुरू होती है इसलिए इसके पहले के सभी वतन परस्तो को हिन्दुस्तान की आजादी का जन्जु कहना मुनासिफ़ नहीं होगा क्योंकि वो सब अपने-अपने वतन के वज़ूद के लिए लड़ रहे थे | तो दो कौड़ी का सवाल ही सही लेकिन क्या किसी ख़ास मज़हब की फ़रमाबरदारी ही वतनपरस्ती है ? और उस ढ़क्कन का क्या, जो मज़हब की नज़र में काफ़िर हैं ? या फिर देश के स्वयंभू तीस-मार-खां टाइप लोग ही तय करेंगे कि देश कौन देश भक्त है और कौन देश द्रोही ?

ग़दर के लगभग 58 वर्ष पहले 4 मई 1799 को 48 वर्ष की आयु में कर्नाटक के श्रीरंगपट्टना में टीपू को धोके से अंग्रेजो ने क़त्ल कर दिया गया | टीपू ने एक बार कहा था, मैं 200 सौ साल गीदड़ की ज़िन्दगी गुज़ारने से अच्छा दो दिन शेर की तरह जीना मंज़ूर करूंगा और उसने ऐसा ही किया भी था | कहते हैं, टीपू अपनी आखरी साँस तक ब्रितानिया हुकूमत से लड़ता रहा और शहीद हो गया | 

मैसूर गजट के संपादक श्रीकांतैयह ने करीब 156 मंदिरों को निशानित किया था जिन्हें टीपू द्वारा नियमित रूप से वार्षिक अनुदान का भुगतान किया जाता था | इस बात के सबूत भी मिलते हैं कि टीपू ने अपने दरबार से मंदिरों के लिए ज़मीन और आर्थिक अनुदान मुहैया करवाया | वहीं कुछ का ये भी दावा है कि उसने हिंदू शासकों के साथ गठबंधन बनाने के लिए ऐसा किया | नंजनगुड के श्रीकण्ठस्वर मंदिर में अभी भी टीपू द्वारा दिया गया कीमती पत्थरों से जड़ा कप मौज़ूद है और ये केवल अकेला सबूत नहीं है, ऐसे ढ़ेरों सबूत मौज़ूद हैं | इसके अलावा टीपू ने एक हरे रंग की शिवलिंग, सात चांदी के कप और एक रजत कपूर बर्नर भी श्रीरंगपट्टनम के रंगनाथ मंदिर को दान में दिया था | रंगनाथ मंदिर टीपू के महल के इतना करीब था कि मंदिर की घंटी और मुअज़्ज़िन की पुकार दोनों सुनाई देती होगी |

करीब 1791 में मराठा सेना ने श्रृंगेरी शंकराचार्य के मठ और मंदिर पर एक छापा मारा जिसमें कई लोग घायल हुए और कई लोग मारे गए और यही नहीं मठ का सारा बेशकीमती सामान लूट लिया गया | इस घटना के बाद मठ के शंकराचार्य ने टीपू से मदद के लिए गुहार लगाई | टीपू ने अपने एक ख़त में लिखा था, "जिन लोगों ने ये जाहिलाना हरक़त की है और मठ जैसी पवित्र जगह को नुक्सान पहुँचाया है उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी" और 200 रहतीस (मुद्रा) श्रृंगेरी शंकराचार्य के मठ को देने का आदेश दिया | हालांकि धर्म परिवर्तन को लेकर उसके प्रेम का सबूत खुद टीपू द्वारा लिखे ख़त से ज़ाहिर होता है जो उसने बेकल के राज्यपाल बुदरुज़ ज़ुमन खान को 19 जनवरी 1790 को लिखे थे लेकिंग इसके बावजूद भी वतन परस्ती और खुद्दारी को टीपू ने सबसे ऊपर रक्खा और ब्रितानिया हुकूमत से जमकर लोहा लिया | टीपू सुलतान हिन्दुस्तान का ऐसा पहला बादशाह था जो मैदाने जंग में ब्रितानियों से लड़ते हुए खाक-ए-सुपुर्द हुआ | एक बात और ब-ज़ाहिर हो कि मराठा और निज़ाम दोनों ने टीपू के ख़िलाफ़ जंग में ब्रितानिया हुकूमत का साथ दिया |


महाराणा प्रताप ने मुगलो के खिलाफ कई लड़ाईयाँ लड़ी और जीवन भर राजपूताना को आज़ाद करने का सपना देखते रहे लेकिन पूरा न कर सके | यहाँ तक कि उन्होंने अकबर के ख़िलाफ़ कोई भी बड़ी जीत हासिल नहीं की लेकिन इसके बावज़ूद भी उनके एक महान जन्जु और वतन परस्त होने पर कोई शक़ नहीं किया जा सकता, और इसी वजह से उन्हें वतन परस्तों और शूरवीरों की फेहरिस्त में बहुत ऊपर रक्खा जाता है और हिन्दुस्तान का महान नायक माना जाता है लेकिन ऐसा इसलिए नहीं कि वो हिन्दू थे बल्कि इसलिए कि वो वतनपरस्त होने के साथ-साथ खुद्दार और बहादुर भी थे | उन्होंने जीते जी अपना सर मुगलो के सामने कभी नहीं झुकाया और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी और उनकी इसी खूबी के लिए लोग आज भी उन्हें बड़ी शिद्दत और एहतराम के साथ याद करते हैं |

इतिहास हम सबको ऐसे ख़ास मौके बहुत कम अता फ़रमाता है जो हमें इसके आशावादी आयाम सोचने पर मजबूर करता हो लेकिन अगर हम एक औंधे घड़े की तरह पड़े रहें तो फिर पड़े रहें | ख़ैर… अगर हम अपने दिमाग के घोड़े खोल दें और इन खुले हुए किसी भी एक घोड़े से पूछें, क्या कोई भी मज़हब मादरे-वतन से बड़ा हो सकता है, तो घोडा बिना हिनहिनाये ही सर हिलाकर बता देगा बता देगा |

टीपू की वतन परस्ती पर सवाल उठाने वाले संघी विचार के लोग शायद ये भूल जाते हैं कि संघ के दूसरे प्रमुख गोलवलकर ने 1940 में ब्रितानियों के खिलाफ न जाने की आधिकारिक रूप से घोषणा की थी और आजादी के आंदोलन की सहभागिता से दूर रहे थे | उन्हें लगता था कि अगर संघ ने ब्रितानिया हुकूमत की मुख़ालफ़त की तो ब्रितानी संघ को प्रतिबंधित कर देंगे और हिन्दू राष्ट्र का सपना धराशाही हो जायेगा | जबकि इसके उलट कुछ संघियों ने इस बात से असहमति जताते हुए आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई | गोलवलकर ने खुद इसे खुले आम स्वीकार किया था जिसके बाक़ायदा सबूत मौज़ूद हैं, जो संघ की मज़हब के आधार पर देश की अवधारणा को दर्शाता है और ये एक समता मूलक समाज कि अवधारणा के बिलकुल ही विपरीत है |

इसी तर्ज पर टीपू की मुख़ालफ़त उसकी मज़हबी सोच के लिए जरूर की जा सकती है और की जानी भी चाहिए लेकिन इसलिए नहीं क्योंकि वो इस्लाम परस्त था | अगर हम कलिंग के कत्लेआम को नजरअंदाज कर सम्राट अशोक को उसकी महानता के लिए तरजीह दे सकते हैं, अगर हम शिवाजी के हिन्दू राष्ट्र को नजरअंदाज कर उनके वतन परस्ती को तरजीह दे सकते है तो टीपू को क्यों नहीं ? क्या इनमें कुछ भी कॉमन नहीं जिस पर हम आगे बढ़ सकें ? चुनांचे, क्या हम वतन परस्ती को मज़हब से ऊपर नहीं रख सकते या फिर मज़हब और वतन के नाम पर छदम राष्ट्रवाद वाले ओलंपिक में हिस्सा लेते रहेंगे और एक दूसरे की ऐसी-तैसी करते रहेंगे ? हालांकि इस ओलंपिक में हिस्सा तो हम सब ज़रूर ले रहें हैं लेकिन जीत कोई नहीं रहा है | इस बात पर मुझे फ़राज़ का एक शेर याद आता है, “वो बेवफ़ा न था यूं ही बदनाम हो गया फ़राज़, हज़ारों चाहने वाले थे किस किस से वफ़ा करता वो” |


ये लेख 16 जनवरी 2017 को Havabaazi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 
http://havabaazi.com/cafe-diary/kranti-ka-rang/

क्रांति का रंग हमेशा लाल ही होता है या कुछ और भी

क्रांति, क्या कभी सोचा है | क्रांति शब्द सुनते ही सबसे पहले ज़हन में क्या आता है, ज़बरन अपना हक़ लेना यही न, फिर चाहे इसके लिए किसी का खून ही क्यों न बहाना पड़े और शायद इसी वजह से क्रांति का रंग लाल होता है हालांकि हमेशा ऐसा नहीं होता | क्रांति का रंग लाल होने से पहले कुछ और भी हो सकता है शायद सफ़ेद भी, हरा भी और पीला भी जो विचारों के परिपक्कव होने के साथ-साथ सुर्ख़ होने लगता है |

क्रांतियां कई तरीके की होती हैं, मसलन राजनीतिक क्रांति, सामजिक क्रांति, आर्थिक क्रांति, औधोगिक क्रांति, सांस्कृतिक क्रांति, वैचारिक क्रांति, वैज्ञानिक क्रांति वगैरह-वगैरह लेकिन मूलरूप से क्रांति शब्द का इस्तेमाल सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन की ओर संकेत करने के लिए किया जाता है | क्रांति जनवादी अधिकारों या संगठनात्मक संरचना में होने वाला एक मूलभूत परिवर्तन है जो अपेक्षाकृत कम समय में ही घटित हो जाता है |

दुनिया की अगर बड़ी क्रांतियों को देखें, मसलन 1775 की अमेरिकी क्रांति, 1789 की फ़्रांस क्रांति, 1857 की भारत क्रांति, 1910 की मेक्सिको क्रान्ति, 1917 की बोल्शेविक क्रान्ति, 1949 की चीनी क्रांति, 1959 की क्यूबा क्रांति और ऐसी न जाने कितनी क्रांतियां जिनमें हज़ारों-लाखों लोग मारे गए और कई लोगों ने अपनी शहादतें दीं | दुनिया में अधिकतर क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने रक्तरंजित क्रांतियां कीं, जैसे जॉर्ज वाशिंगटन, मंगल पांडे, फ्रांसिस्को मदेरो, व्लादिमीर लेनिन, माओत्से तुंग, एरनेस्टो चे गुएवारा, फिदेल कास्त्रो, हो चि मिन्ह, सुभाष चंद्र बोस और न जाने ऐसे कितने हज़ारों लाखों नाम हैं, लेकिन ये असल मुद्दा नहीं है, सवाल ये है कि क्रांति का रंग केवल लाल ही होता है या कुछ और भी ?   

सरदार भगत सिंह, ये एक ऐसा नाम है जिसका ज़िक्र किये बगैर क्रांति और इसके मकसद को समझना लगभग नामुमकिन सा है | जब भी भगत सिंह का ज़िक्र होता है तो अधिकतर लोगों को लगता है इनकी विचारधारा में अपनी बात कहने और मनवाने के लिए ईंट का ज़वाब पत्थर से देना ही एक मात्र विकल्प होता है लेकिन ये सिर्फ आधा सच भर है | भगत सिंह रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से पूरी तरह प्रभावित थे | यही नहीं, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे और ये बात उनके लिखे लेखों और उपलब्ध दस्तावेजों से साफ़ पता चलती है | वो समाज़वादी विचारधारा के बल पर राजनितिक और सामजिक बदलाव चाहते थे और इसका सबसे बड़ा प्रमाण था संसद में उस जगह पर बम फेंकना जिसमें कोई हताहत न हो जबकि वो चाहते तो लोगों को मार सकते थे और वो भी ये जानते हुए कि इस घटना के बात अंग्रेजी हुक़ूमत उन्हें फँसी पर लटका देगी | उन्होंने कहा था, "बहरों को सुनाने के लिए धमाके कि ज़रुरत होती है" और यही नहीं उन्होंने जेल में 64 दिन की भूख हड़ताल भी की थी जो इस बात को साबित करती है कि क्रांति का रंग हमेशा लाल नहीं होता |

अमीर मीनाई का एक शेर है, “तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर, सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर” | इस शेर को दो तरह से समझ जा सकता है, एक- ये जैसा लिखा गया है और दूसरा- भगत सिंह की विचारधारा के रूप में लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि भगत सिंह ग़ांधीवादी थे | भगत सिंह ने कहा था, “क्रांति की तलवार विचारों की शान पर तेज़ होती है” | वो चाहते थे कि आने वाली नस्लें साम्राज्य और पूंजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति का हिस्सा बने | 19 अक्टूबर 1929 को पंजाब छात्र संघ, लाहौर को भेजे अपने पत्र में उन्होंने कहा था, “इस समय हम नवजवानों को ये नहीं कह सकते कि बम और पिस्तौल उठायें | आज नवजवानों के सामने इससे भी अधिक ज़रूरी काम हैं | नवजवानों को क्रांति का सन्देश देश-दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाना है, फैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूरों ,खेत में काम करने वाले किसानों, गन्दी बस्तियों और झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों में क्रांति की अलख जगानी है ताकि एक आदमीं दूसरे आदमीं का और एक राष्ट्र दूसरे राष्ट का शोषण न कर सके” | जेल में लिखे गए उनके दस्तावेजों से पता चलता है कि वो त्वरित सशस्त्र क्रांति के पक्ष में नहीं थे हालांकि वो ये भी मानते थे कि बिना रक्तरंजित क्रांति के पूंजीवाद का सफाया नहीं किया जा सकता और समाजवाद स्थापित नहीं किया जा सकता और इसी वजह से वो किसानों-मज़दूरों, छात्रों-युवाओं के खुले जन-संगठन बनाने  और वैचारिक रूप से तैयार होने पर बल दे रहे थे और जब वो ये कह रहे थे तब वो हिंसा की बात बिलकुल भी नहीं कर रहे थे |

भगत सिंह के साथ-साथ चे गुएवारा भी मार्क्स-लेनिन विचारधार से प्रभावित थे और समाजवाद के पक्षधर थे | एक बार एक अमेरिकी पत्रकार के पूछने पर कि एक आदर्श क्रांतिकारी में आप क्या देखते हैं तो उन्होंने कहा था, “एक अच्छा क्रांतिकारी वही हो सकता है जिसमें प्यार की प्रबल भावना हो (The True Revolutionary Is Guided by Strong Feelings of Love)”.  भगत सिंह और चे गुएवारा दोनों ही वैचारिक क्रांति के बल पर राजनितिक और सामजिक बदलाव चाहते थे लेकिन रक्तरंजित क्रांति को आख़िरी चुनाव के रूप में देखते थे | दोनों का सपना तो पूरी तरह से हकीकत में नही बदल पाया लेकिन उनके संघर्ष ने देश और दुनिया की क्रांतियों को एक नयी दिशा दी और इसकी मूल परिभाषा को बदल दिया | अंत में आपको बृज नारायण चकबस्त के शेर के साथ छोड़े जाता हूँ……

उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है, 
हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है
चमकता है शहीदों का लहू पर्दे में क़ुदरत के, 
शफ़क़ का हुस्न क्या है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है



ये लेख 06 जनवरी 2017 को Havabaazi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 
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