रविवार, 19 फ़रवरी 2017

न हारा है इश्क़ न दुनिया थकी है


ज़नाब मोहम्मद हैदर ख़ान | आप भी सोच रहे होंगे कि भला ये शख्सियत कौन हैं | मैं इनका ज़िक्र क्यों कर रहा हूँ जबकि नाम भी सुना-सुना सा नही लगता | चलो मैं ज्यादा ख़ुफ़ियापंती नहीं करता हूँ आपको बताए देता हूँ इस अज़ीम शख्सियत के बारे में | इन्हें आप "ख़ुमार बाराबंकवी" के नाम से भी जानते हैं | ख़ुमार उनका तख़ल्लुस था | उर्दू के जाने माने शायर कुंवर मोहिंदर सिंह बेदी "सहर" ने ख़ुमार साहब की मौज़ूदगी में एक बार कहा था कि इनका तख़ल्लुस इनकी शायरी से बिलकुल भी मेल नहीं खाता | दरअसल इनका तख़ल्लुस ख़ुमार नहीं सुरूर होना चाहिए क्योंकि ख़ुमार उस नशे को कहते हैं जो उतर रहा हो जबकि ख़ुमार साहब की शायरी उभरते हुए नशे की तरह है जिसे सुरूर कहते है | ख़ुमार साहब को उनके बेहद करीबी लोग दुल्लन कहकर भी बुलाते थे |

15 सितम्बर 1919 को बाराबंकी के कटरा-पीरबटावन मोहल्ले में जन्मे ख़ुमार साहब को शेरो-शायरी का हुनर विरासत में मिला | ख़ुमार साहब के वालिद जनाब डॉ. ग़ुलाम हैदर सलामस और मर्सिया वगैरह अपने तख़ल्लुस "बहार" के नाम से लिखा करते थे | इनके चचा "करार बाराबंकवी" ख़ुद एक मकबूल शायर थे और इन्होंने ही ख़ुमार साहब को शेरो-शायरी की बारीकियों से वाकिफ़ कराया | इनके भाई काज़मी हैदर "निगार" भी एक शायर थे | तो कुल मिलकर लब्बोलबाब ये है कि शायरी ख़ुमार साहब के ख़ून में दौड़ती थी |

ख़ुमार साहब एक शायर होने के आलावा एक अच्छे तालिब भी थे लेकिन जब वो इंटरमीडिएट करने के लिए लखनऊ आये तो एक ख़ूबसूरत मोड़ ने इन्हें पढ़ाई छोड़ने पर मज़बूर कर दिया और यहीं से उनकी शायरी ने एक नया सफ़र तय करना शुरू किया जो हर रोज़ एक नयी बुलंदियों को छूने लगा |

ख़ुमार साहब की शायरी का हर कोई कायल था तो भला मैं कैसे बच सकता था | उन दिनों इन्टरनेट यूट्यूब का चलन नहीं था | हम लोग ऑडियो कैस्सेट्स पर उनकी शायरी और ग़ज़लें सुना करते थे या फ़िर आमने-सामने मुशायरे में | मैंने पहली बार उनको बाराबंकी में होने वाले देवां मेले में सुना | क्या मतले थे, क्या शेर थे और और क्या ग़ज़ल थी | एक-एक शेर जैसे करीने के साथ तराशा गया हो | उनके हर एक शेर से इश्क़ और मोहब्बत की शबनम टपक रही थी | उनकी शेरो-शायरी तो बेहतरीन थी ही और साथ ही उनकी आवाज़ और तरन्नुम भी अव्वल दर्ज़े का था | कहते हैं, इश्क़ पर मीर और दाग़ से बेहतर किसी और ने नहीं लिखा (और भी हो सकते हैं जो मेरी नज़र में नहीं हैं, जिगर उनके समकालीन थे इसलिए उनका ज़िक्र यहाँ नहीं कर रहा हूँ) लेकिन इन दोनों की शायरी आम लोगों की समझ के बाहर थी क्योंकि वो बहुत कठिन लब्जों का इस्तेमाल किया करते थे जबकि ख़ुमार साहब की शायरी आम लोगों की चलतुआ ज़बान में थी इसलिए उसकी पहुँच बहुत दूर तक हुई और ऊपर से जानलेवा तरन्नुम और हर मिसरे के बाद आदाब कहने की उनकी अदा उन्हें दूसरे शायरों से मुख्तलिफ़ करती थी |

ख़ुमार ने अपना पहला मुशायरा 1938 में बरेली में पढ़ा | उनका पहला शेर “वाकिफ नहीं तुम अपनी निगाहों के असर से, इस राज को पूछो किसी बरबाद नजर से” था | इसके बाद, ढाई वर्ष के दौरान में ही वे पूरे मुल्क में मशहूर हो गये | उस दौर में जिगर मुरादाबादी अव्वल दर्ज़े के शायर माने जाते थे चूंकि ख़ुमार साहब ने तरन्नुम से शुरूआत की इसलिए बहुत जल्द ही वे जिगर मुरादाबादी के करीब पहुँच गये | मुशायरों में अगर मजरूह सुलतानपुरी साहब के बाद अगर किसी को तवज्जो दी जाती थी तो वो "ख़ुमार साहब" ही थे |    

एक रोज़ मैं ख़ुमार साहब की गज़लें सुन रहा था तभी एक साहब आए और कहने लगे, "ये तो कुमार बाराबंकी (ख़ुमार बाराबंकवी) की आवाज़ है | मैंने कहा, "जी हाँ वहीँ हैं" | वो साहब कहने लगे, “अरे इनको तो मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ, यदाकदा ट्रेन में मिलते रहते हैं | कोई शायर-वायर हैं | ट्रेन में भी शेरो-शायरी सुनाते रहते हैं | किसी को मना नहीं करते, बस पान की गिलौरियाँ खिलाते रहो और शेरो-शायरी सुनते रहो” |

आप इस बात से दो अंदाज़े लगा सकते हैं, एक, उन साहब को ये बिलकुल भी इल्म नहीं था कि वो कितने बड़े शायर हैं और दूसरा ख़ुमार साहब ने किसी को ये अंदाजा लगाने का मौका ही नहीं दिया कि वो कितने बड़े शायर हैं | इससे एक बात और बज़ाहिर होती है कि वो एक बड़े शायर होने के साथ-साथ एक बेहतरीन शाख्सियत के मालिक भी थे | वैसे तो ख़ुमार साहब ने तमाम फ़िल्मों के लिये गीत-ग़ज़लें लिखी लेकिन फ़िल्म "बारादरी" के लिये 1955 में लिखा गया उनका नग्मा "तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती" कुंदन लाल सहगल की आवाज़ में आज भी लोगों के दिलों में ताज़ा-तरीन हैं | उन्होंने तमाम फिल्मों को अपने नग्में-गज़लें दी और तमाम बुलंदियों को हासिल किया लेकिन इसके बावज़ूद भी उन्होंने अपनी नज़रें ज़मीन की तरफ ही रक्खीं | हर कोई उनसे बात कर सकता था, मिल सकता था और वो सबके लिए हाज़िर थे |

मैंने उन साहब से गुज़ारिश की, “एक बार मुझे भी ख़ुमार साहब से मिलवायें” | वो बोले, “हाँ-हाँ ज़रूर, इसमें कौन सी बड़ी बात है, बहुत ही धांसू शख्श हैं, कटरा-पीरबटावन में रहते हैं, अब की बार मिलेगें तो कह देंगे की घर पर मिलना है, फिर चले चलेंगे” हालांकि मुझे पता था ये मेरे लिए कितनी बड़ी बात है | अब इसे इत्तेफाक कहें या मेरी ख़ुशनसीबी | वर्ष मुझे ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन फ़िर भी ये बात होगी क़रीब बरस 1995-1996 की | ख़ुमार साहब किसी मुशायरे की लिए बांद्रा ट्रेन से कहीं जा रहे थे | उस दिन मैं भी बाराबंकी से लखनऊ उसी ट्रेन से जा रहा था उन्हीं साहब के साथ जिन्हें मुझे ख़ुमार साहब से मिलवाने का वादा किया था | उस दिन ट्रेन के आने में कुछ वक़्त था इसलिए हम दोनों बाराबंकी स्टेशन पर चाय पीने लगे | तभी उन साहब ने अचानक कहा, "लो तुम्हारी मुराद पूरी हुई" | मैं ख़बर से अनजान, “कौन सी मुराद ”? “अरे कुमार बाराबंकी से नहीं मिलना है” ? “कहाँ”? “वो क्या रहे” | मेरी तो ख़ुशी का तो जैसे ठिकाना न रहा कि मैं ख़ुमार साहब से रूबरू होने वाला हूँ तभी मरदुआ ट्रेन आ धमकी |

हम और वो साहब बिजली की रफ़्तार से उसी डिब्बे की तरफ लपके जिधर ख़ुमार साहब जा रहे थे | हम उनके पीछे-पीछे उनकी सीट के सामने वाली सीट पर बैठ गए | उन साहब ने ख़ुमार साहब को आदाब-अर्ज़ किया और ख़ुमार साहब ने उन्हें | उन साहब ने मेरा भी तार्रुफ़ ख़ुमार साहब से करवाया | ख़ुमार साहब मुस्कुराये और बोले, “बेटा क्या करते हो” | मैंने कहा, “जी ग्रेजुएशन कर रहा हूँ लखनऊ यूनिवर्सिटी से” | बोले, “बहुत बढ़िया” | मैंने कहा, “ख़ुमार साहब, मैंने आपको एक बार देवां मेले में सुना था और अब आपको ऑडियो कैसेट पर सुनता हूँ | आप बहुत ही बेहतरीन लिखते हैं | मैं तो कायल हूँ आपकी शायरी का” | ख़ुमार साहब कहने लगे, “मैं कहाँ लिखता हूँ, ये सब अल्ला-मियाँ की मेहरबानी है और आप लोगों की मोहब्बत है वरना मैं किस क़ाबिल हूँ” | मैंने ख़ुमार साहब से बिना इज़ाज़त लिए एक सवाल किया, “आपने फ़िल्मों कुछ गाने भी लिखे लेकिन फिर बीच में छोड़कर क्यों चले आये” तो उन्होंने अपना ज़वाब इस शेर से दिया, “कोई धोका न खा जाए मेरी तरह, ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिए” / “अक्ल-ओ-दिल अपनी-अपनी कहें जब ‘ख़ुमार’, अक्ल की सुनिए, दिल का कहा कीजिये” और फ़िर कहने लगे बेटा, “लिखता जभी हूँ जब ऊपर वाला दिल से रूबरू होता है जबकि फ़िल्मों में ज़रुरत के हिसाब से लिखना पड़ता है जो मुझसे नहीं हो पाया” | भला हो नौशाद साहब का जिन्होंने मुझे फिल्मों में मौका दिया लेकिन मुझे मुशायरे ही मुबारक | कुछ देर तक ख़ुमार साहब से बात होती रही | वो पान की तही गिलौरियाँ खाते रहे और शेर सुनाते रहे | उस दिन हमारा वक़्त ऐसे गुज़रा कि पता ही नहीं चला और हमारा स्टेशन आ गया | हमारी मुलाक़ात बहुत छोटी थी लेकिन ख़ुमार साहब से मिलकर ऐसा लगा जैसे मैं उन्हें बरसों से जानता हूँ | इतना बड़ा शख्स और इतना आसान, यकीन नहीं हो रहा था |

ख़ुमार साहब, उन शोरा में से थे जो ग़ज़ल के उसी शर्मीले, लज़ीले और रसीले अंदाज़ के रसिया थे जिसे हम क्लासिकी ग़ज़ल कहते हैं | तरक्की पसंद तहरीक़ सरबुलंदियों के वक़्त जब ग़ज़ल पर बड़ा कड़ा वक़्त था तब भी उन्होंने हसरत और जिगर की तरह ग़ज़ल का दामन नहीं छोड़ा और अपने आप को इस ख़ूबसूरत सी शायरी का निगेहबान साबित किया | वो अपने मुनफ़रीद अशआर और ख़ूबसूरत तरन्नुम के साथ मुशायरों को लूट लिया करते थे | उनकी शायरी में वो जादू था कि लोग घंटो तक उन्हें उठने ही नहीं दिया करते थे |

एक बार एक मुशायरे के सिलसिले में ख़ुमार साहब अमेरिका गए तो वहाँ के एक रिपोर्टर ने पूछा, "आपका इस देश के बारे में क्या ख़्याल है" ? तो ख़ुमार साहब ने बड़े तपाक से कहा, "मैं गलत उम्र में सही जगह आ गया हूँ" ऐसी ज़िंदादिल शख्शियत के मालिक थे, ख़ुमार साहब |

ख़ुमार साहब ने चार किताबें भी लिखीं, “शब-ए-ताब”, “हदीस-ए-दीगर”, “आतिश-ए-तर” और “रख्स-ए- मय” है | ख़ुमार साहब का आख़िरी वक़्त बहुत अच्छा नहीं रहा और एक साल की लंबी बीमारी के बाद 19 फरवरी 1999 की रात उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया | उन्होंने उर्दू अदब और शायरी में वो जगह छोड़ी जिसे अब तक भरा नहीं जा सका है और शायद वो कभी नहीं भरेगा | 
      
ख़ुमार साहब ने एक से बढ़कर एक ग़ज़लें लिखीं और उन्हीं में से एक ग़ज़ल के कुछ चंद अशआर आपके पेश-ए-ख़िदमत है;

न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है, दिया जल रहा है हवा चल रही है
सुकू ही सुकू है खुशी ही खुशी है, तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है
वो मौज़ूद है और उनकी कमी है, मुहब्बत भी तहाई-ए-दायमी है 
खटक गुदगुदगी का मज़ा दे रही है, जिसे इश्क कहते है शायद यही है..


ये लेख 19 फरवरी 2017 को Havabaazi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 

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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

इश्क़ तौफ़ीक़ है



इश्क़ | महज़ एक अदना सा लफ्ज़ जिसे हासिल करने से पहले इसमें फ़ना होना पड़ता है | यही एक ऐसी चीज़ है जिसमें आप जितना डूबते हैं आप उतना और ज़्यादा निख़र कर उभरते हैं | हम में से ज़्यादातर लोग इश्क़ को माशूका से जोड़कर देखते हैं लेकिन माशूका सिर्फ लड़की ही हो ऐसा भी नहीं है | इश्क़ हम हर उस चीज़ से कर सकते हैं जिसे हम दिल-ओ-जान से चाहते हों, मोहब्बत करते हों | मसलन अपनी ज़मीन, अपनी मिट्टी, अपना वतन, अपनी भाषा, माता-पिता-बीबी-भाई-बहन-दोस्त- रिश्ते और भी बहुत कुछ… | जैसे रंग किसी एक का नहीं होता उसी तरह इश्क़ भी किसी एक रंग का नहीं होता | इसके अनगिनत रंग होते हैं | जिस रंग में रंग जाओ वही तुम्हारा और तुम उसके | इश्क़ उस तरल की तरह होता है जिसे जिस सांचे में डाल दिया जाता है इश्क़ उसका और वो इश्क़ का हो जाता है |

अभी मैं जिस इश्किया रंग की बात करने जा रहा हूँ उसमें माशूका उसकी ज़मीन, उसकी मिट्टी और उसका वतन होता है और इस इश्क़ का रंग बाकी सारे रंगों में सबसे ज़्यादा सुर्ख होता है | इस बात पर लाल चन्द फ़लक का ये शेर एकदम दुरुस्त बैठता है, “दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त, मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी” | वैसे तो 14 जनवरी वैलेंटाइन डे के नाम से मनाया जाता है, यानी इश्क़ और मोहब्बत का दिन लेकिन इश्क़ का कोई एक दिन नहीं होता, इश्क़ तो हर ऱोज होता है, हर घड़ी पनपता है, फलता है, फूलता है | इश्क़ हर वक़्त मौज़ूद रहता है किसी न किसी शक्ल में, किसी की जिंदगी में, किसी के सपनो में, किसी की यादों में, किसी की बातों में, किसी के शहर में, किसी के वतन में, किसी की मिट्टी में… |

16 साल की उम्र और साल था 1923 का | भगत सिंह नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ते थे और जन जागरण के लिए नाटक में हिस्सा लिया करते थे और यहीं पर उनकी मुलाक़ात क्रन्तिकारी उस्तादों और तालिबों के साथ हुई | और यहीं से उनका आज़ादी के लिए इश्क़ और मोहब्बतों का दौर कुलांचे मारने लगा | उन दिनों शादी थोड़ा जल्दी हो जाया करती थी चुनांचे भगत सिंह की दादी ने भी रिश्ते की बात चलानी शुरू कर दी | भगत सिंह ने अपनी दादी को बहुत समझाया लेकिन जब उनकी एक न चली तो उन्होंने अपने वालिद साहब को एक ख़त लिखा और कानपुर गणेश शंकर विद्यार्थी के पास पहुँच कर हिंदी साप्ताहिक प्रताप में काम करना शुरू कर दिया | भगत सिंह ने अपने ख़त में जो लिखा उसका तर्जुमा कुछ इस तरह है, “मेरी ज़िन्दगी का मक़सदे-आला वतन की आज़ादी है | मैं अपनी ज़िन्दगी आज़ादी-ए-हिंद के असूल के लिए वक्फ़ कर चूका हूँ इसलिए मेरी ज़िन्दगी में आराम और दुनिया के तमाम खाहशात के लिए कोई जगह नहीं है | मेरी माशूका तो वतन की आज़ादी है” | इसके आगे की दास्ताँ तो आप सबको पता ही है लेकिन एक बात बाबत हो, इस दुनिया में सभी पैदा होते हैं मरने के लिए लेकिन मौत वही होती है जिसे दुनिया याद रक्खे लेकिन ये तभी मुमकिन हैं जब आप किसी से प्यार करें, मोहब्बत करें और ताउम्र उसकी हिफाज़त करें |

एक जुमला तो आपने यक़ीनन ही सुना होगा, “जब दिल आया गदहिया पर तो परी क्या चीज़ है” | वैसे तो ये एक तंज है लेकिन मुझे इसमें इश्क़, माशूक और माशूका की इन्तहा दिखाई देती है | इश्क़ किसी रंग, सूरत, मज़हब और सरहदों का मोहताज़ नहीं होता | इश्क़ तो सिर्फ इश्क़ होता है, न इससे कुछ कम और न इससे कुछ ज्यादा | कहते हैं, लैला की सूरत बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन उसकी सीरत मजनूँ को इतनी पसंद थी कि उसके आगे सूरत का कोई मोल नहीं था | इसी तरह माँ को अपना बच्चा दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत बच्चा लगता है फिर उसकी सूरत-सीरत चाहे जैसी हो | यहाँ तक कि वो ख़ुद भूखी रहती है लेकिन अपने बच्चों को भूखा नहीं रहने देती और ये बात सिर्फ इंसानो तक ही सीमित नहीं है बल्कि जानवरों तक पर लागू होती है | दरअसल ये सब भी इश्क़ के ही रंग हैं | इन रंगों में सिर्फ और सिर्फ इश्क़ होता है, मोहब्बत होती है और उसका महबूब होता है इसके अलावा और कुछ भी नहीं | इश्क़ हमें समर्पण सिखाता है, ज़िन्दगी जीने का सलीका सिखाता है चुनांचे इश्क़ से बड़ा कोई मज़हब नहीं, इश्क़ से बड़ी कोई बात नहीं और यहाँ तक कि इश्क़ से बड़ा कोई खुदा भी नहीं | “वसुधैव कुटुम्बकम”, ये जिसका भी ख़्याल रहा होगा बहुत ही ख़ूबसूरत ख़्याल रहा होगा | दो मिनट सोचकर कर देखिये, वो दुनिया कैसी होगी जिसमें ये ख़याल होगा | ये हमें जोड़ना सिखाता है, मजहब और सरहद से मुख़्तलिफ़ लेकिन हम तभी एक हो सकते हैं जब हम एक दूसरे से मोहब्बत करें और एक दूसरे को वैसे ही तस्लीम करें जैसे हैं |

इश्क़ में कोई शर्त भी नहीं होती | दरअसल इश्क़ की तो बस एक ही शर्त होती है, इसमें कोई शर्त नहीं होती और शायद इसी वजह से मैंने ये शेर कहा, “मेरा उसके ख्यालों से मुत्तफ़िक़ होना नामुमकिन सा था, जब सौदा हुआ इश्क़ का तो महंगा क्या और सस्ता क्या” |

“कुछ खेल नहीं है इश्क़ करना, ये ज़िन्दगी भर का रत जगा है”, अहमद नदीम क़ासमी साहब का ये शेर ये बताता है कि इश्क़ एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है इसलिए अगर हम किसी एक ख़ास दिन इसे मना कर छोड़ दे तो वैलेंटाइन डे मनाने का कोई फायदा नहीं हालांकि इसका ये मतलब भी नहीं निकलता कि हम वैलेंटाइन डे न मनाये | हमें हर उस अवसर का जश्न मनाना चाहिए जो हमें मोहब्बत सिखाता हो, इश्क़ सिखाता हो और उनसे तो बिलकुल भी नहीं डरना चाहिए जिन्होंने ख़ुद अपने आप को ही धर्म, समाज और संस्कृति बचाने का ठेका दे रक्खा हो | और इन्हीं ठेकेदारों की समाअतो के हवाले फ़िराक गोरखपुरी साहब का ये शेर, “कोई समझे तो एक बात कहूँ, इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं” |

आख़िर में बस इतना ही…, आप इश्क़ करें, मोहब्बत करें और ज़िंदाबाद रहें |

ये लेख 09 फरवरी 2017 को gappagosthi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 
http://www.gappagosthi.com/pages/IL_ISHQ_TAUFIQ_HAI.html

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

पंखेबाज़ और उनकी पंखेबाज़ी



वैसे तो पंखा यानी अंग्रेजी में फैन, हवा देने के काम आता है लेकिन जब हम किसी के फैन हो जाते हैं तो हम वास्तव में एक पंखा हो जाते हैं | पंखा अपने आप नहीं चलता, उसे चलाना पड़ता है और एक बार चल पड़े तो ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं रुकता बल्कि उसे बटन दबा कर रोकना पड़ता है | मशीन वाला पंखा ठीक इसी पद्धति पर काम करता है लेकिन जब हम इस स्वाभाव को अपना लेते हैं तो हम विचार-विमर्श करने की अपनी ताकत से मुँह-हाँथ-पैर सब धो बैठते हैं |

हम अक़्सर किसी की बात, बरताव और विचारों से प्रभावित हो जाते हैं और होना लाज़मीं भी हैं, होना भी चाहिए आख़िरकार हम इंसान हैं जानवर नहीं | लेकिन किसी से प्रभावित होना एक बात होती है और उसकी हर एक बात को पत्थर की लक़ीर मान लेना दूसरी बात होती है और इसी प्रचंड अंधभक्ति के गर्भ से पैदा होता है “पंखेबाज़ और उसकी पंखेबाज़ी” और उससे पैदा होने वाले ख़तरे |

जब हम पूरी तौर पर पंखेबाज़ हो जाते हैं तब हम अपनी पंखेबाज़ी के बल पर दूसरों के विचार-विमर्श को सिरे से ख़ारिज़ करने लगते हैं | उसे हम धर्म विरोधी, समाजविरोधी, देशद्रोही वैगेरह-वैगेरह बताने लगते हैं | ये ख़तरा तब और भी बड़ा हो जाता है जब समाज का एक बड़ा तबका पंखेबाज़ हो जाता है और उस छोटे तबके को सिरे से ख़ारिज करने लगता है जो पंखेबाज़ तबके और उसकी पंखेबाज़ी से इत्तेफ़ाक नहीं रखता | ये सिलसिला सिर्फ़ यहीं ख़त्म नहीं होता बल्कि धुवांधार बदस्तूर जारी रहता है | अंततः छोटा तबका धीरे-धीरे कमज़ोर होकर टूटने लगता है और फ़िर एक दिन ये पूरी तौर पर ख़त्म हो जाता है, और तब, हम जिसके पंखे बने होते है वो हमें अपनी उँगलियों पर मदारी की तरह नचाने लगता है, बिलकुल वैसे जैसे मशीन वाला पंखा नाचता है | इसके बाद हमारे सामने नाचने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता फिर चाहे आपका दिल करे या न करे क्योंकि विचार-विमर्श की लिए कोई जगह नहीं रह जाती | और अगर हममें से कोई नाचने से इनकार करता है तो वो मदारी जिसके लिए हम पंखेबाज़ बने होते हैं अपने डंडे से ज़मूरे की तरह हांकने लगता है | ये सारे लक्षण हमें तानाशाही और फासीवाद की तरफ ले जाते हैं जहाँ दूसरे विचार की कोई गुंजाईश नहीं रहती |

कबीर दास पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन वो बिना किसी वैज्ञानिक तर्क के किसी भी विचार को मानने के लिए तैयार नहीं होते थे | वो कहते थे, “पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़, घर की चाकी कोई ना पूजे, जाको पीस खाए संसार” सिर्फ़ यही नहीं वो सीधे-सीधे हर उस विचार को चुनौती देते थे जो उनकी व्यवहारिक समझ के बाहर है और शायद इसीलिए उन्होंने कहा, “कंकड़ पत्थर जोड़ के मस्जिद लियो बनाए, ता चढ मुल्ला बांग दे क्या बहिरा हुआ खुदाए” | वो हर विचार को व्यवहारिक तरीके से समझने का प्रयास करते थे और अपनी बेबाक़ राय सबके सामने रखते थे लेकिन वो किसी का पंखा होने को तैयार नहीं थे, शायद वो इसके ख़तरे जानते होंगे | गाँधी जी कहते थे, जो विचार नागरिक अधिकारों के ख़िलाफ़ हों उस पर सवाल ज़रूर उठाने चाहिए, उन अधिकारों को तोडना चाहिए, उसका भर्सक विरोध करना चाहिए फ़िर चाहे वो किसी अपने प्रिय के ही क्यों न हों | भगत सिंह कहते थे, अन्याय सिर्फ अन्याय होता है फ़िर चाहे कोई अपना करे या कोई दूसरा, सबका जमकर पुरज़ोर विरोध होना चाहिए | इसलिए अगर हम पंखा बन जाते हैं तो फ़िर विरोध और आलोचना को बर्दाश्त करने की ताकत को खो देते हैं | हम हर एक विरोध और आलोचना को व्यक्तिगत विरोध के रूप में लेने लगते हैं और ख़ुद को एक संकीर्ण और अंधे गहरे कुवें में धकेलते चले जाते हैं |

मेरे इस लेख का मतलब कोई ज्ञान देना नहीं है और न ही किसी की धार्मिक, राजनितिक और सामाजिक भावनाओं को ठेस बहुचाने का है बल्कि आत्मचिंतन करने का है कि किसी के अंध-भक्त होने के कितने गंभीर ख़तरे हो सकते हैं और कब ये भक्ति पंखेबाज़ी में बदल जाए और अंततः गुंडेबाज़ी और फ़िर हिंसा में | इस हालत में एक अच्छा समाज कभी नहीं बन सकता जिसमें सबको अपनी बात बे-रोक टोक कहने की आज़ादी हो | हाँ, सहमति असहमति ज़रूर हो सकती है और होनी भी चाहिए | अंग्रेजी में एक शब्द है backfire जिसका मतलब होता है दूसरों के लिए लगाई गयी आग एक दिन ख़ुद के दर-ओ-दीवार को निस्त-ओ-नाबूत कर देती है, मतलब पंखेबाज़ और उनकी पंखेबाज़ी को ही backfire हो जाता है | नाज़ी की तानाशाही और मुसेलिनी का फ़ासीवाद इसके प्रमुख उदहारण हैं | शौक़ बहराइची का एक बहुत ही मशहूर शेर है, “बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है, हर शाख पे उल्लू बैठें हैं अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा” इसलिए हमें ये देखना होगा कि शाख़-ए-गुल पर कोई पंखेबाज़ न बैठने पाए, यानी उल्लू |

पंखेबाज और उनकी पंखेबाज़ी की नज़र बहादुरशाह ज़फ़र का ये ख़ास शेर, "न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब-ओ-हुनर, पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा" हालांकि मैं ना-उमीद नहीं हूँ जब मैं नरेश कुमार शाद का ये शेर पढ़ता हूँ, "ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो, मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो" |


ये लेख 03 फरवरी 2017 को Havabaazi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 
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