इश्क़ तौफ़ीक़ है
इश्क़ | महज़ एक अदना सा लफ्ज़ जिसे हासिल करने से पहले इसमें फ़ना
होना पड़ता है | यही एक ऐसी चीज़ है जिसमें आप जितना डूबते हैं आप उतना और ज़्यादा
निख़र कर उभरते हैं | हम में से ज़्यादातर लोग इश्क़ को माशूका से जोड़कर देखते हैं लेकिन
माशूका सिर्फ लड़की ही हो ऐसा भी नहीं है | इश्क़ हम हर उस चीज़ से कर सकते हैं जिसे
हम दिल-ओ-जान से चाहते हों, मोहब्बत करते हों | मसलन अपनी ज़मीन, अपनी मिट्टी, अपना
वतन, अपनी भाषा, माता-पिता-बीबी-भाई-बहन-दोस्त- रिश्ते और भी बहुत कुछ… | जैसे रंग
किसी एक का नहीं होता उसी तरह इश्क़ भी किसी एक रंग का नहीं होता | इसके अनगिनत रंग
होते हैं | जिस रंग में रंग जाओ वही तुम्हारा और तुम उसके | इश्क़ उस तरल की तरह
होता है जिसे जिस सांचे में डाल दिया जाता है इश्क़ उसका और वो इश्क़ का हो जाता है |
अभी मैं जिस इश्किया रंग की बात करने जा रहा हूँ उसमें माशूका उसकी
ज़मीन, उसकी मिट्टी
और उसका वतन होता है और इस इश्क़ का रंग बाकी सारे रंगों में सबसे ज़्यादा सुर्ख
होता है | इस बात पर लाल चन्द फ़लक का ये शेर एकदम दुरुस्त बैठता है, “दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त, मेरी
मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी” | वैसे तो 14 जनवरी वैलेंटाइन डे के
नाम से मनाया जाता है, यानी इश्क़ और मोहब्बत का दिन लेकिन इश्क़ का कोई एक दिन नहीं
होता, इश्क़ तो हर ऱोज होता है, हर घड़ी पनपता है, फलता है, फूलता है |
इश्क़
हर वक़्त मौज़ूद रहता है किसी न किसी शक्ल में, किसी की जिंदगी में, किसी के सपनो
में, किसी की यादों में, किसी की बातों
में, किसी के शहर में, किसी के वतन में,
किसी
की मिट्टी में… |
16 साल की
उम्र और साल था 1923 का | भगत सिंह नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ते थे और जन जागरण के
लिए नाटक में हिस्सा लिया करते थे और यहीं पर उनकी मुलाक़ात क्रन्तिकारी उस्तादों
और तालिबों के साथ हुई | और यहीं से उनका आज़ादी के लिए इश्क़ और मोहब्बतों का दौर कुलांचे
मारने लगा | उन दिनों शादी थोड़ा जल्दी हो जाया करती थी चुनांचे भगत सिंह की दादी
ने भी रिश्ते की बात चलानी शुरू कर दी | भगत सिंह ने अपनी दादी को बहुत समझाया
लेकिन जब उनकी एक न चली तो उन्होंने अपने वालिद साहब को एक ख़त लिखा और कानपुर गणेश
शंकर विद्यार्थी के पास पहुँच कर हिंदी साप्ताहिक प्रताप में काम करना शुरू कर
दिया | भगत सिंह ने अपने ख़त में जो लिखा उसका तर्जुमा कुछ इस तरह है, “मेरी ज़िन्दगी का मक़सदे-आला वतन की आज़ादी है | मैं
अपनी ज़िन्दगी आज़ादी-ए-हिंद के असूल के लिए वक्फ़ कर चूका हूँ इसलिए मेरी ज़िन्दगी
में आराम और दुनिया के तमाम खाहशात के लिए कोई जगह नहीं है | मेरी माशूका
तो वतन की आज़ादी है” | इसके आगे की दास्ताँ तो आप सबको पता ही है लेकिन एक बात बाबत
हो, इस दुनिया में सभी पैदा होते हैं मरने के लिए लेकिन मौत वही होती है जिसे
दुनिया याद रक्खे लेकिन ये तभी मुमकिन हैं जब आप किसी से प्यार करें, मोहब्बत करें
और ताउम्र उसकी हिफाज़त करें |
एक जुमला तो आपने यक़ीनन ही सुना होगा, “जब
दिल आया गदहिया पर तो परी क्या चीज़ है” | वैसे तो ये एक तंज है
लेकिन मुझे इसमें इश्क़, माशूक और माशूका की इन्तहा दिखाई देती है | इश्क़ किसी रंग,
सूरत, मज़हब और सरहदों का मोहताज़ नहीं होता | इश्क़ तो सिर्फ इश्क़ होता है, न इससे
कुछ कम और न इससे कुछ ज्यादा | कहते हैं, लैला की सूरत बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन
उसकी सीरत मजनूँ को इतनी पसंद थी कि उसके आगे सूरत का कोई मोल नहीं था | इसी तरह
माँ को अपना बच्चा दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत बच्चा लगता है फिर उसकी सूरत-सीरत चाहे
जैसी हो | यहाँ तक कि वो ख़ुद भूखी रहती है लेकिन अपने बच्चों को भूखा नहीं रहने
देती और ये बात सिर्फ इंसानो तक ही सीमित नहीं है बल्कि जानवरों तक पर लागू होती
है | दरअसल ये सब भी इश्क़ के ही रंग हैं | इन रंगों में सिर्फ और सिर्फ इश्क़ होता
है, मोहब्बत होती है और उसका महबूब होता है इसके अलावा और कुछ भी नहीं | इश्क़ हमें
समर्पण सिखाता है, ज़िन्दगी जीने का सलीका सिखाता है चुनांचे इश्क़ से बड़ा कोई मज़हब
नहीं, इश्क़ से बड़ी कोई बात नहीं
और
यहाँ तक कि इश्क़ से बड़ा कोई खुदा भी नहीं | “वसुधैव
कुटुम्बकम”, ये जिसका भी ख़्याल रहा होगा बहुत ही ख़ूबसूरत ख़्याल रहा होगा | दो मिनट
सोचकर कर देखिये, वो दुनिया कैसी होगी जिसमें ये ख़याल होगा | ये हमें जोड़ना सिखाता
है, मजहब और सरहद से मुख़्तलिफ़ लेकिन हम तभी एक हो सकते हैं जब हम एक दूसरे से
मोहब्बत करें और एक दूसरे को वैसे ही तस्लीम करें जैसे हैं |
इश्क़ में कोई शर्त भी नहीं होती | दरअसल इश्क़ की तो बस एक ही शर्त
होती है, इसमें कोई शर्त नहीं होती और शायद इसी वजह से मैंने ये शेर कहा, “मेरा उसके ख्यालों से मुत्तफ़िक़ होना नामुमकिन सा
था, जब सौदा हुआ इश्क़ का तो महंगा क्या और सस्ता क्या” |
“कुछ खेल नहीं है इश्क़ करना, ये ज़िन्दगी भर का रत
जगा है”, अहमद नदीम क़ासमी
साहब का ये शेर ये बताता है कि इश्क़ एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है इसलिए अगर
हम किसी एक ख़ास दिन इसे मना कर छोड़ दे तो वैलेंटाइन डे मनाने का कोई फायदा नहीं
हालांकि इसका ये मतलब भी नहीं निकलता कि हम वैलेंटाइन डे न मनाये | हमें हर उस
अवसर का जश्न मनाना चाहिए जो हमें मोहब्बत सिखाता हो, इश्क़ सिखाता हो और उनसे तो
बिलकुल भी नहीं डरना चाहिए जिन्होंने ख़ुद अपने आप को ही धर्म, समाज और संस्कृति
बचाने का ठेका दे रक्खा हो | और इन्हीं ठेकेदारों की समाअतो के हवाले फ़िराक
गोरखपुरी साहब का ये शेर, “कोई समझे तो
एक बात कहूँ, इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं” |
आख़िर में बस
इतना ही…, आप इश्क़ करें, मोहब्बत करें और ज़िंदाबाद रहें |
ये लेख 09 फरवरी 2017 को gappagosthi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं |
http://www.gappagosthi.com/pages/IL_ISHQ_TAUFIQ_HAI.html

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