गुरुवार, 19 जनवरी 2017

वो बेवफ़ा न था यूं ही बदनाम हो गया

1857 की ग़दर में न जाने कितने लोगों ने अपनी सहादत दी | कुछ लोगों के नाम इतिहास में दर्ज हुए और कुछ हमेशा के लिए गुमनाम हो गए | ग़दर का अगर इतिहास उठाकर देखें तो हमें ये इल्म हो जायेगा कि ब्रितानिया हुकूमत ने ग़दर को निस्ते नाबूत करने के लिए आज़ादी के परवानो को बड़ी ही बेरहमी से क़त्ल किया और जो क़त्ल किये गए उनमें हर मज़हब और जाति के लोग थे | 


हिन्दुस्तान राष्ट्र बनने की असल अवधारणा 1857 की ग़दर के साथ शुरू होती है इसलिए इसके पहले के सभी वतन परस्तो को हिन्दुस्तान की आजादी का जन्जु कहना मुनासिफ़ नहीं होगा क्योंकि वो सब अपने-अपने वतन के वज़ूद के लिए लड़ रहे थे | तो दो कौड़ी का सवाल ही सही लेकिन क्या किसी ख़ास मज़हब की फ़रमाबरदारी ही वतनपरस्ती है ? और उस ढ़क्कन का क्या, जो मज़हब की नज़र में काफ़िर हैं ? या फिर देश के स्वयंभू तीस-मार-खां टाइप लोग ही तय करेंगे कि देश कौन देश भक्त है और कौन देश द्रोही ?

ग़दर के लगभग 58 वर्ष पहले 4 मई 1799 को 48 वर्ष की आयु में कर्नाटक के श्रीरंगपट्टना में टीपू को धोके से अंग्रेजो ने क़त्ल कर दिया गया | टीपू ने एक बार कहा था, मैं 200 सौ साल गीदड़ की ज़िन्दगी गुज़ारने से अच्छा दो दिन शेर की तरह जीना मंज़ूर करूंगा और उसने ऐसा ही किया भी था | कहते हैं, टीपू अपनी आखरी साँस तक ब्रितानिया हुकूमत से लड़ता रहा और शहीद हो गया | 

मैसूर गजट के संपादक श्रीकांतैयह ने करीब 156 मंदिरों को निशानित किया था जिन्हें टीपू द्वारा नियमित रूप से वार्षिक अनुदान का भुगतान किया जाता था | इस बात के सबूत भी मिलते हैं कि टीपू ने अपने दरबार से मंदिरों के लिए ज़मीन और आर्थिक अनुदान मुहैया करवाया | वहीं कुछ का ये भी दावा है कि उसने हिंदू शासकों के साथ गठबंधन बनाने के लिए ऐसा किया | नंजनगुड के श्रीकण्ठस्वर मंदिर में अभी भी टीपू द्वारा दिया गया कीमती पत्थरों से जड़ा कप मौज़ूद है और ये केवल अकेला सबूत नहीं है, ऐसे ढ़ेरों सबूत मौज़ूद हैं | इसके अलावा टीपू ने एक हरे रंग की शिवलिंग, सात चांदी के कप और एक रजत कपूर बर्नर भी श्रीरंगपट्टनम के रंगनाथ मंदिर को दान में दिया था | रंगनाथ मंदिर टीपू के महल के इतना करीब था कि मंदिर की घंटी और मुअज़्ज़िन की पुकार दोनों सुनाई देती होगी |

करीब 1791 में मराठा सेना ने श्रृंगेरी शंकराचार्य के मठ और मंदिर पर एक छापा मारा जिसमें कई लोग घायल हुए और कई लोग मारे गए और यही नहीं मठ का सारा बेशकीमती सामान लूट लिया गया | इस घटना के बाद मठ के शंकराचार्य ने टीपू से मदद के लिए गुहार लगाई | टीपू ने अपने एक ख़त में लिखा था, "जिन लोगों ने ये जाहिलाना हरक़त की है और मठ जैसी पवित्र जगह को नुक्सान पहुँचाया है उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी" और 200 रहतीस (मुद्रा) श्रृंगेरी शंकराचार्य के मठ को देने का आदेश दिया | हालांकि धर्म परिवर्तन को लेकर उसके प्रेम का सबूत खुद टीपू द्वारा लिखे ख़त से ज़ाहिर होता है जो उसने बेकल के राज्यपाल बुदरुज़ ज़ुमन खान को 19 जनवरी 1790 को लिखे थे लेकिंग इसके बावजूद भी वतन परस्ती और खुद्दारी को टीपू ने सबसे ऊपर रक्खा और ब्रितानिया हुकूमत से जमकर लोहा लिया | टीपू सुलतान हिन्दुस्तान का ऐसा पहला बादशाह था जो मैदाने जंग में ब्रितानियों से लड़ते हुए खाक-ए-सुपुर्द हुआ | एक बात और ब-ज़ाहिर हो कि मराठा और निज़ाम दोनों ने टीपू के ख़िलाफ़ जंग में ब्रितानिया हुकूमत का साथ दिया |


महाराणा प्रताप ने मुगलो के खिलाफ कई लड़ाईयाँ लड़ी और जीवन भर राजपूताना को आज़ाद करने का सपना देखते रहे लेकिन पूरा न कर सके | यहाँ तक कि उन्होंने अकबर के ख़िलाफ़ कोई भी बड़ी जीत हासिल नहीं की लेकिन इसके बावज़ूद भी उनके एक महान जन्जु और वतन परस्त होने पर कोई शक़ नहीं किया जा सकता, और इसी वजह से उन्हें वतन परस्तों और शूरवीरों की फेहरिस्त में बहुत ऊपर रक्खा जाता है और हिन्दुस्तान का महान नायक माना जाता है लेकिन ऐसा इसलिए नहीं कि वो हिन्दू थे बल्कि इसलिए कि वो वतनपरस्त होने के साथ-साथ खुद्दार और बहादुर भी थे | उन्होंने जीते जी अपना सर मुगलो के सामने कभी नहीं झुकाया और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी और उनकी इसी खूबी के लिए लोग आज भी उन्हें बड़ी शिद्दत और एहतराम के साथ याद करते हैं |

इतिहास हम सबको ऐसे ख़ास मौके बहुत कम अता फ़रमाता है जो हमें इसके आशावादी आयाम सोचने पर मजबूर करता हो लेकिन अगर हम एक औंधे घड़े की तरह पड़े रहें तो फिर पड़े रहें | ख़ैर… अगर हम अपने दिमाग के घोड़े खोल दें और इन खुले हुए किसी भी एक घोड़े से पूछें, क्या कोई भी मज़हब मादरे-वतन से बड़ा हो सकता है, तो घोडा बिना हिनहिनाये ही सर हिलाकर बता देगा बता देगा |

टीपू की वतन परस्ती पर सवाल उठाने वाले संघी विचार के लोग शायद ये भूल जाते हैं कि संघ के दूसरे प्रमुख गोलवलकर ने 1940 में ब्रितानियों के खिलाफ न जाने की आधिकारिक रूप से घोषणा की थी और आजादी के आंदोलन की सहभागिता से दूर रहे थे | उन्हें लगता था कि अगर संघ ने ब्रितानिया हुकूमत की मुख़ालफ़त की तो ब्रितानी संघ को प्रतिबंधित कर देंगे और हिन्दू राष्ट्र का सपना धराशाही हो जायेगा | जबकि इसके उलट कुछ संघियों ने इस बात से असहमति जताते हुए आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई | गोलवलकर ने खुद इसे खुले आम स्वीकार किया था जिसके बाक़ायदा सबूत मौज़ूद हैं, जो संघ की मज़हब के आधार पर देश की अवधारणा को दर्शाता है और ये एक समता मूलक समाज कि अवधारणा के बिलकुल ही विपरीत है |

इसी तर्ज पर टीपू की मुख़ालफ़त उसकी मज़हबी सोच के लिए जरूर की जा सकती है और की जानी भी चाहिए लेकिन इसलिए नहीं क्योंकि वो इस्लाम परस्त था | अगर हम कलिंग के कत्लेआम को नजरअंदाज कर सम्राट अशोक को उसकी महानता के लिए तरजीह दे सकते हैं, अगर हम शिवाजी के हिन्दू राष्ट्र को नजरअंदाज कर उनके वतन परस्ती को तरजीह दे सकते है तो टीपू को क्यों नहीं ? क्या इनमें कुछ भी कॉमन नहीं जिस पर हम आगे बढ़ सकें ? चुनांचे, क्या हम वतन परस्ती को मज़हब से ऊपर नहीं रख सकते या फिर मज़हब और वतन के नाम पर छदम राष्ट्रवाद वाले ओलंपिक में हिस्सा लेते रहेंगे और एक दूसरे की ऐसी-तैसी करते रहेंगे ? हालांकि इस ओलंपिक में हिस्सा तो हम सब ज़रूर ले रहें हैं लेकिन जीत कोई नहीं रहा है | इस बात पर मुझे फ़राज़ का एक शेर याद आता है, “वो बेवफ़ा न था यूं ही बदनाम हो गया फ़राज़, हज़ारों चाहने वाले थे किस किस से वफ़ा करता वो” |


ये लेख 16 जनवरी 2017 को Havabaazi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 
http://havabaazi.com/cafe-diary/kranti-ka-rang/

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