गुरुवार, 19 जनवरी 2017

क्रांति का रंग हमेशा लाल ही होता है या कुछ और भी

क्रांति, क्या कभी सोचा है | क्रांति शब्द सुनते ही सबसे पहले ज़हन में क्या आता है, ज़बरन अपना हक़ लेना यही न, फिर चाहे इसके लिए किसी का खून ही क्यों न बहाना पड़े और शायद इसी वजह से क्रांति का रंग लाल होता है हालांकि हमेशा ऐसा नहीं होता | क्रांति का रंग लाल होने से पहले कुछ और भी हो सकता है शायद सफ़ेद भी, हरा भी और पीला भी जो विचारों के परिपक्कव होने के साथ-साथ सुर्ख़ होने लगता है |

क्रांतियां कई तरीके की होती हैं, मसलन राजनीतिक क्रांति, सामजिक क्रांति, आर्थिक क्रांति, औधोगिक क्रांति, सांस्कृतिक क्रांति, वैचारिक क्रांति, वैज्ञानिक क्रांति वगैरह-वगैरह लेकिन मूलरूप से क्रांति शब्द का इस्तेमाल सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन की ओर संकेत करने के लिए किया जाता है | क्रांति जनवादी अधिकारों या संगठनात्मक संरचना में होने वाला एक मूलभूत परिवर्तन है जो अपेक्षाकृत कम समय में ही घटित हो जाता है |

दुनिया की अगर बड़ी क्रांतियों को देखें, मसलन 1775 की अमेरिकी क्रांति, 1789 की फ़्रांस क्रांति, 1857 की भारत क्रांति, 1910 की मेक्सिको क्रान्ति, 1917 की बोल्शेविक क्रान्ति, 1949 की चीनी क्रांति, 1959 की क्यूबा क्रांति और ऐसी न जाने कितनी क्रांतियां जिनमें हज़ारों-लाखों लोग मारे गए और कई लोगों ने अपनी शहादतें दीं | दुनिया में अधिकतर क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने रक्तरंजित क्रांतियां कीं, जैसे जॉर्ज वाशिंगटन, मंगल पांडे, फ्रांसिस्को मदेरो, व्लादिमीर लेनिन, माओत्से तुंग, एरनेस्टो चे गुएवारा, फिदेल कास्त्रो, हो चि मिन्ह, सुभाष चंद्र बोस और न जाने ऐसे कितने हज़ारों लाखों नाम हैं, लेकिन ये असल मुद्दा नहीं है, सवाल ये है कि क्रांति का रंग केवल लाल ही होता है या कुछ और भी ?   

सरदार भगत सिंह, ये एक ऐसा नाम है जिसका ज़िक्र किये बगैर क्रांति और इसके मकसद को समझना लगभग नामुमकिन सा है | जब भी भगत सिंह का ज़िक्र होता है तो अधिकतर लोगों को लगता है इनकी विचारधारा में अपनी बात कहने और मनवाने के लिए ईंट का ज़वाब पत्थर से देना ही एक मात्र विकल्प होता है लेकिन ये सिर्फ आधा सच भर है | भगत सिंह रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से पूरी तरह प्रभावित थे | यही नहीं, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे और ये बात उनके लिखे लेखों और उपलब्ध दस्तावेजों से साफ़ पता चलती है | वो समाज़वादी विचारधारा के बल पर राजनितिक और सामजिक बदलाव चाहते थे और इसका सबसे बड़ा प्रमाण था संसद में उस जगह पर बम फेंकना जिसमें कोई हताहत न हो जबकि वो चाहते तो लोगों को मार सकते थे और वो भी ये जानते हुए कि इस घटना के बात अंग्रेजी हुक़ूमत उन्हें फँसी पर लटका देगी | उन्होंने कहा था, "बहरों को सुनाने के लिए धमाके कि ज़रुरत होती है" और यही नहीं उन्होंने जेल में 64 दिन की भूख हड़ताल भी की थी जो इस बात को साबित करती है कि क्रांति का रंग हमेशा लाल नहीं होता |

अमीर मीनाई का एक शेर है, “तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर, सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर” | इस शेर को दो तरह से समझ जा सकता है, एक- ये जैसा लिखा गया है और दूसरा- भगत सिंह की विचारधारा के रूप में लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि भगत सिंह ग़ांधीवादी थे | भगत सिंह ने कहा था, “क्रांति की तलवार विचारों की शान पर तेज़ होती है” | वो चाहते थे कि आने वाली नस्लें साम्राज्य और पूंजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति का हिस्सा बने | 19 अक्टूबर 1929 को पंजाब छात्र संघ, लाहौर को भेजे अपने पत्र में उन्होंने कहा था, “इस समय हम नवजवानों को ये नहीं कह सकते कि बम और पिस्तौल उठायें | आज नवजवानों के सामने इससे भी अधिक ज़रूरी काम हैं | नवजवानों को क्रांति का सन्देश देश-दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाना है, फैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूरों ,खेत में काम करने वाले किसानों, गन्दी बस्तियों और झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों में क्रांति की अलख जगानी है ताकि एक आदमीं दूसरे आदमीं का और एक राष्ट्र दूसरे राष्ट का शोषण न कर सके” | जेल में लिखे गए उनके दस्तावेजों से पता चलता है कि वो त्वरित सशस्त्र क्रांति के पक्ष में नहीं थे हालांकि वो ये भी मानते थे कि बिना रक्तरंजित क्रांति के पूंजीवाद का सफाया नहीं किया जा सकता और समाजवाद स्थापित नहीं किया जा सकता और इसी वजह से वो किसानों-मज़दूरों, छात्रों-युवाओं के खुले जन-संगठन बनाने  और वैचारिक रूप से तैयार होने पर बल दे रहे थे और जब वो ये कह रहे थे तब वो हिंसा की बात बिलकुल भी नहीं कर रहे थे |

भगत सिंह के साथ-साथ चे गुएवारा भी मार्क्स-लेनिन विचारधार से प्रभावित थे और समाजवाद के पक्षधर थे | एक बार एक अमेरिकी पत्रकार के पूछने पर कि एक आदर्श क्रांतिकारी में आप क्या देखते हैं तो उन्होंने कहा था, “एक अच्छा क्रांतिकारी वही हो सकता है जिसमें प्यार की प्रबल भावना हो (The True Revolutionary Is Guided by Strong Feelings of Love)”.  भगत सिंह और चे गुएवारा दोनों ही वैचारिक क्रांति के बल पर राजनितिक और सामजिक बदलाव चाहते थे लेकिन रक्तरंजित क्रांति को आख़िरी चुनाव के रूप में देखते थे | दोनों का सपना तो पूरी तरह से हकीकत में नही बदल पाया लेकिन उनके संघर्ष ने देश और दुनिया की क्रांतियों को एक नयी दिशा दी और इसकी मूल परिभाषा को बदल दिया | अंत में आपको बृज नारायण चकबस्त के शेर के साथ छोड़े जाता हूँ……

उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है, 
हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है
चमकता है शहीदों का लहू पर्दे में क़ुदरत के, 
शफ़क़ का हुस्न क्या है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है



ये लेख 06 जनवरी 2017 को Havabaazi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 
http://havabaazi.com/cafe-diary/kranti-ka-rang/


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें