क्या क़ानून और इंसाफ़ लोगों
के गुस्से से तय होगा
निर्भया ! उसे
ये नया नाम क्यों दिया गया ? उसे इस नाम से क्यों बुलाया जा रहा है ? उसका असली नाम
क्यों नहीं लिया जा रहा है ? ये सिर्फ कुछ सवाल हैं | उसने तो कोई अपराध नहीं किया
था | हैवानियत तो इंसान की शक्ल में छुपे उन पांच दरिंदो ने की थी तो फिर निर्भया को
उसके असली नाम से क्यों नहीं बुलाया जा रहा है ? हालांकि बिलकिस बानो के मामले में
ऐसा नहीं हुआ | उसे उसके नाम से ही बुलाया जा रहा है जोकि मेरे समझ से बुलाया जाना
भी चाहिए क्योंकि इज़्ज़त उसकी नहीं उन दरिंदों की लुटी है जिन्होंने उसके साथ हैवानियत
की |
मुझे एक बात बिलकुल
भी समझ में नहीं आती कि जब भी किसी बच्ची, लड़की या फिर महिला के साथ बलात्कार होता
है तो हमारा समाज जिसमें मैं भी शामिल हूँ क्यों कहता है कि एक या कई दरिंदो ने मिलकर
उसकी इज़्ज़त लूट ली | तो सवाल ये है कि क्या उसकी इज़्ज़त उसकी वैजाइना में होती है ?
जबकि दरिंदगी इंसानी भेष में मौजूद दरिंदे करते हैं | इन दरिंदो को जानवर इसलिए नहीं
कह रहा हूँ क्योंकि जानवर कहना जानवरों की बेज़्ज़ती होगी |
हम इन दरिंदो की
हैवानियत के लिए इनकी परवरिश को ज़िम्मेदार मानने लगते हैं जिसमें कुछ हद तक सच्चाई
भी होती होगी | लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि कोई माँ-बाप अपने बच्चों को इस तरह की हरकतों
के लिए कभी नहीं उकसाता होगा या करने के लिए कहता होगा फिर चाहे उन माँ-बाप की परवरिश
कैसे भी माहौल में क्यों न हुई हो | हाँ, परवरिश और आस-पास का माहौल इनकी दरिंदगी में
इज़ाफ़ा ज़रूर करता है | दरअसल इस तरह की हैवानियत करने वाले लोगों के रवैये में ही दरिंदगी
होती है जिसे बदला नहीं जा सकता | तो फिर एक सवाल पैदा होता है कि कैसे इन दरिंदों
को फिर से इंसान बनाया जाए या फिर कैसे इनका रवैया बदला जाए ? दरअसल इस किस्म के लोग
कुदरती तौर पर ही दरिंदे होते हैं | ये उस कैंसर की तरह होते हैं जिनका कोई इलाज़ नहीं
होता | इनका
तो सिर्फ और सिर्फ एक ही इलाज़ होता है कि इन्हें वक़्त रहते पहचानकर इन्हें काट कर फेंक
दिया जाए हालांकि इन्हें अमूमन किसी हैवानियत से भरी वारदात के बाद ही पहचाना जा सकता
है उससे पहले नहीं | लेकिन कम से कम हम जब भी इन्हें पहचान पाएं काट कर फेंक दें जिससे
इनकी परवरिश और इनके आस-पास के माहौल पर इसका कुछ असर ज़रूर पड़े | पर… एक मिनट रुकिए,
मेरा काट कर फेंक देने से ये मतलब नहीं है कि हम जनता जनार्दन हाँथ में तलवार लेकर
इन्हें काटने निकल पड़े | दरअसल हमें अपनी विधायिका पर इतना दबाव बढ़ा देना चाहिए कि
वो ऐसे सख़्त से सख़्त क़ानून बनाये और सिर्फ बनाये ही नहीं बल्कि ये भी पक्का करे कि
पुलिस और अदालतें अपना काम ठीक से करें जिससे ऐसे हर एक मामले में एक ही तरह ही सजा
हो | और यकीनन वो सजा न्यूनतम मौत ही होनी चाहिए | इसके साथ-साथ हम अपने समाज की सही
परवरिश पर भी ध्यान दें लेकिन उन फ़िल्मी हीरो की तरह नहीं जो पब्लिक में तो बड़ी-बड़ी
बातें करते हैं लेकिन अपनी फिल्मों में लड़कियों को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करते हैं
|
निर्भया को तो
जनता के भारी दबाव के चलते उसके साथ हुई हैवानियत का इंसाफ़ मिल गया लेकिन क्या बिलकिस
बानो को भी उतना ही इंसाफ़ मिला जितना निर्भया को ? शायद नहीं | निर्भया के मामले में
छह लोग शामिल थे जिनमें से एक ने ख़ुद को मार लिया और चार को मौत की सजा सुनाई गयी और
एक नबालिग को 3 साल की कैद के बाद बरी कर दिया गया जिसे नहीं होना चाहिए था लेकिन बिलकिस
बानो के मामले में 11 दरिंदों को सिर्फ उम्र कैद ? जबकि 2 डॉक्टर और 6 पुलिसवालों को
महज़ 20 हजार रुपए और कुछ सालों की जेल के बाद रिहा कर दिया गया | गुजरात दंगों के दौरान
19 साल की बिलकिस बानो का बलात्कार तो किया ही गया जब वो 5 महीने की गर्भवती थी और
साथ ही बिलकिस बानो के परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी गयी | तो फिर से एक सवाल,
इंसाफ़ में ये दोहरा रवैया क्यों ? एक ही गुनाह की अलग-अलग सज़ा क्यों ? शायद हमने बिलकिस
बानो वाले
मामले में वो सब नहीं किया जो निर्भया और जेसिका लाल के मामले में किया | लेकिन हमें
इन मामलों में वो सब क्यों करना चाहिए ? क़ानून और इंसाफ़ अपना काम ख़ुद क्यों नहीं करता
? वैसे तो मुझे देश के क़ानून पर भरोसा है लेकिन जब भी मैं ये बात कहता हूँ मेरी जबान
ख़ुद बख़ुद लड़खड़ाने लगती है और ये एक सवाल है ? क्या मुल्क में क़ानून और इंसाफ़ लोगों
के गुस्से से तय होगा या फिर क़ानून और इंसाफ़ अपने आप होते हुए भी दिखेगा ?
मुल्क में रोज़
न जाने कितने निर्भया और बिलकिस बानो जैसे मामले होते हैं जो पता तक नहीं चल पाते और
जो पता चल भी पाते हैं उनमें पूरा इंसाफ़ नहीं हो पता | और अगर आप गरीब हैं,
मज़लूम हैं
तब तो कानून और इंसाफ़ आपके लिए है ही नहीं | और ये एक ज़हीन मुल्क और ज़म्हूरियत के तौर
पर हमारी शिकस्त है | माफ़ कीजियेगा लेकिन जिस मुल्क में मंत्री से लेकर संतरी तक घूस
लेते हों उस मुल्क के क़ानून पर सिर्फ धन्ना सेठों को ही भरोसा हो सकता है आम आदमीं
को नहीं | हालांकि इसके बावज़ूद भी हमें ज़म्हूरियत और मुल्क के कानून पर अपना भरोसा
बनाये रखना चाहिए क्योंकि ज़म्हूरियत में जन आंदोलन ही विधायिका से अपनी बात मनवाने
का एक मात्र रास्ता हैं |

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