शनिवार, 10 जून 2017

मर जवान मर किसान

मर जवान मर किसान ! चौंकिए मत अब से यही नया नारा है, अच्छा है शास्त्री जी हमारे बीच ज़िंदा नहीं हैं वार्ना मुझ पर लानत भेजते | एक तरफ देश के जवान कूटे जा रहे हैं जबकि दूसरी तरफ देश के किसानों को अपना मल मूत्र तक पीना पड़ रहा है | ऐसे में मुझे उन लोगों की याद पटक-पटक कर मार रही है जो देश के किसानों की बातें करते-करते संसद पहुँच गए और ख़ामोश हो गए | मुझे तो याद नहीं लेकिन अगर आपको याद हो तो ज़रूर बताना, मैंने आज तक तथाकथित जीडीपी का ढ़ोल पीटने वाले लोगों को कभी अपना मल मूत्र खाते नहीं देखा, हाँ ! बड़े-बड़े होटलों में ज़ाम छलकाते ज़रूर देखा है जबकि जीडीपी में सबसे बड़ा हिस्सा देने वाला देश का दम तोड़ता किसान है अतिवादी उपाय करने को मज़बूर है | 

चाणक्य ने सही ही कहा था, सत्ता का चरित्र एक सामान होता है फिर चाहे सत्ता फलाने की हो या ढ़िमकाने की | १४ मार्च को तमिलनाडु से आये किसान अपनी बात सरकार तक पहुँचाने के लिए तरह-तरह के उपाय कर रहे हैं, कुछ उपाय अतिवादी भी हो सकते हैं लेकिन ये सोचने वाली बात है कि अतिवाद की ज़रुरत क्यों पड़ रही है ? सरकार उनके मन की बात क्यों नहीं सुन रही है ? इसका मतलब एकदम साफ़ है | सरकार जान बूझकर गूंगी और बहरी तो बने ही रहना चाहती है और साथ में हमारे तथाकथित प्रधान सेवक तो एक और कदम आगे हैं | वो तो केवल अपने मन की बात ही करते हैं, किसी दूसरे के मन की बात से उन्हें कोई सरोकार नहीं | उन्हें फोटो सेशन और बक-बक से फुर्सत मिले तब तो ग़ैर ज़रूरी लोगों की ग़ैर ज़रूरी बातें सुने | दरअसल ये जनता जनार्दन की ही गलती है जिसका ख़ामियाज़ा इन बेचारे किसानों को भुगतना पड़ रहा है | हमने सरकार में बैठे लोगों को इतना ऊँचा उठा दिया है जिसके वो कहीं से भी लायक नहीं हैं जबकि असल बात ये है ये सब जनता के सेवक हैं, हमारे सर्विस प्रोवाइडर हैं और इनके साथ वही सलूक होना चाहिए जैसा हम किसी सर्विस प्रोवाइडर के साथ करते हैं, सर्विस न मिलने पर |

कुछ तथाकथित नेता-नेती जंतर मंतर ज़रूर पहुँचे हैं लेकिन किसानों की बात सुनने नहीं बल्कि सेल्फी नामक राष्ट्रीय रोग का टीकाकरण करवाने और ये बताने कि अगर राजनितिक रोटी सेंकी जाए तो कुछ टुकड़े उन्हें भी मिल जाए | किसानों की समस्याएं आज अचानक से पैदा नहीं हुईं हैं बल्कि ये तो बरसों से बदस्तूर चलती चली आ रही हैं और इसकी ज़िम्मेदार हर वो सरकारें रहीं हैं जो सत्ता में रहीं हैं | पहले तो विपक्ष हुआ करता था जो किसानों और मज़दूरों के कुछ मुद्दे उठाया करता था लेकिन अब तो वो भी नदारद है | मीडिया अब जनता के सरोकार को उठाने के बजाय सरकारों की दलाली करने में मशगूल है | अब ऐसे हालात में बेचारे किसानों को अपनी बात कहने के लिए मल मूत्र नहीं खाना पड़ेगा तो और क्या करना पड़ेगा |

जंतर मंतर पर किसान हर वो कोशिश कर रहे हैं जिससे उनकी बात प्रधान सेवक जी के बंद कानो तक पहुँचे | इसी वज़ह से, कभी वो मुँह में चूहा दबा लेते हैं तो कभी सांप खाने लगते हैं, कभी ज़मीन पर ही खाना परोसकर खाने लगते हैं तो कभी नंगे होकर तपती ज़मीन पर लोटने लगते हैं | सिर्फ यही नहीं, वो अपने मरे हुए किसान साथियों की खोपड़ियां पहन कर बैठ जाते हैं और पागलों की तरह चिल्लाने लगते हैं लेकिन प्रधान सेवक जी पता नहीं कौन सी सेवा में मशरूफ़ हैं कि उन्हें इन किसानों से मिलने में ऐतराज़ है | इसलिए मुझे तो शक़ होता है कि वो सचमुच के प्रधान सेवक हैं या उन्होंने जुमले में ही कह दिया था कि मैं देश का प्रधान सेवक हूँ | किसी ने एकदम दुरुस्त ही कहा है, “नंग बड़ा परमेश्वर से” लेकिन यहाँ पर नंग कौन है मुझे बताने की कोई ज़रुरत नहीं हैं क्योंकि आप समझदार हैं |

मेरे तो कान पाक चुके हैं, तीन साल हो गए मेक इन इंडिया सुनते-सुनते और अब हाल ये है कि मवाद तक निकलने लगा है | किसान जो देश के लिए मेक इन इंडिया के सबसे बड़े नुमाइंदे हैं उन्हें भरपेट खाना पानी तक नहीं मिल पा रहा है, क़र्ज़ के बोझ से आत्महत्या तक कर रहे हैं लेकिन जब वो अपनी समस्या कहने दिल्ली आते हैं तो उन्हें नौटंकी-बाज़ और विरोधी दलों की साज़िश बताकर ख़ारिज़ कर दिया जाता है | सरकार कुछ इस अंदाज़ में पेश आ रही है कि तुम लोगों को जो करना हो कर लो तुम्हारी एक नहीं सुनी जायेगी | इन मुट्ठी भर किसानों का आंदोलन मुझे जनलोकपाल आंदोलन की याद दिलाता है जिसे उस वक़्त की तात्कालिक सरकार कुछ इसी अंदाज़ में ख़ारिज़ किया करती थी और जिसका नतीजा ये हुआ वो गए और ये आये | देश में अलगाववाद और नक्सलवाद कुछ इसी तरह की सरकारी उदासीनता के जीते जागते उदहारण हैं इसलिए प्रधान सेवक जी अभी भी देर नहीं हुई है, आप कुछ वक़्त निकालकर इनसे मिलें और इनकी बातें ग़ौर से सुने, इनकी हर संभव मद्दद करें वार्ना कहीं ऐसा ना हो जाए कि इनका सब्र टूट जाए और यकीन मानिये जिस दिन ऐसा हुए तुम क्या और तुम्हारी बिसात क्या | चलते-चलते एक बात और, "दुनिया में सबसे ताकतवर आदमीं वो होता है जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता" बाकी आप होशियार हैं समझदार हैं इसलिए ख़बरदार कर रहा हूँ | 

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