मैसूर का बाघ, जिसका लोहा अंग्रेजों ने
भी माना
आपने टीपू सुल्तान
की शमशीर, फिराक़दिली और उसकी जांबाज़ी के किस्से तो यक़ीनन ही सुने होंगे लेकिन क्या
आपको इस बात का भी इल्म है कि टीपू की तकनीकी में भी अच्छी ख़ासी दिलचस्पी थी | क्या
आपने टीपू सुल्तान के मैकेनिकल बाघ के बारे में सुना है ? हो सकता हो सुना हो, लेकिन
कोई बात नहीं अगर नहीं सुना | चलिए मैं आपको सीधे विक्टोरीया एंड आल्बर्ट म्यूज़ीयम,
लंदन से इस मैकेनिकल बाघ और टीपू से बाघ के तमाम रिश्तों के बारे में रूबरू करवाता
हूँ जिसे टीपू ने 1790 में बनवाया था |
देखने में टीपू का
मैकेनिकल बाघ बिलकुल असल बाघ जितना ही बड़ा है | ये लकड़ी, पीतल और हांथी दांत से बना
हुआ है | इसने एक अंग्रेज सिपाही को अपने चारों पंजों के बीच फंसाकर उसकी गर्दन पर
अपने दाँत गड़ाए हुए है | बाघ के बदन के ठीक पहले पंजे के ऊपर एक हैंडल लगा हुआ है
जिसे घुमाते ही उस अंग्रेज सिपाही का बायां हाँथ ऊपर नीचे होने लगता है और वह अपने
मुँह से निकलने वाली हवा को बाधित करने लगता है जिसकी वजह से ऐसी आवाज़ निकलने लगती
है जैसे वो दर्द से कराह रहा हो, मर रहा हो | और बाघ उसे खाने की कोशिश कर रहा हो
| जब ऐसा हो रहा होता है ठीक उसी वक़्त बाघ के मुँह से दहाड़ने की आवाज़ें भी निकलने
लगती हैं | दरअसल इसके पेट में एक छोटा सा दरवाजा सा लगा जिसे खोलते ही हारमोनियम जैसा
हांथी दांत का बना कीबोर्ड नज़र आने लगता है, और इस पर लगे बटन को दबाने से ये हारमोनियम
के मानिंद बजने लगता है | टीपू के वक़्त में बाघ के बदन पर बनी धारियां टीपू के वक़्त
की अमलदारी, तर्ज़-ए-हकूमत और निज़ाम-ए-हकूमत को बयान करती थीं |
टीपू को बाघ शायद
कुछ ज़्यादा ही पसंद थे और शायद यही वजह रही होगी कि उसने अपने तख़्त (सिंघासन) के हर
पाए के उपर सोने से बने हुए दहाड़ते बाघ लगवाए थे और उन पर तमाम जवाहरात भी जड़वाए थे
| श्रीरंगपट्ट्नम की लूट के वक़्त अंग्रेज सिपाहियों ने टीपू के तख़्त को बड़ी ही बर्बरता
के साथ हथौड़ों की मद्दद से तोड़ कर आपस में बांट लिया था हालांकि तख़्त के कुछ ख़ास हिस्से
जिसमें बाघ का हीरे जवाहरात से जड़ा मुँह ईस्ट इंडिया कंपनी के वज़ीर के सुपूर्त कर दिया
गया था जो आज भी विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में मौज़ूद है | हालांकि ईस्ट इंडिया
कंपनी के वज़ीर इस शानदार और बेहद ख़ूबसूरत तख़्त को इंग्लैंड के राजा को तोहफे में देना
चाहते थे जो न हो सका |
टीपू के वक़्त चलने
वाले सिक्कों तक पर बाघ की धारियां बनी हुईं थीं | सिर्फ़ यहीं नहीं, टीपू की शमशीर
की मूठ और उसकी फ्लिंटलॉक बंदूक के कुंदे पर भी बाघ बना हुआ है | पहली एंग्लो-मैसूर
जंग में टीपू की फ़ौज ने अंग्रेजों के ऊपर राकेट से इतना जबरदस्त हमला किया था कि अंग्रेज
सिपाहियों के छक्के छूट गए थे और वो समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिर ये कौन सा हथियार
है | इस जंग में अंग्रेजों को बहुत ज़बरदस्त जान माल का नुकसान हुआ था | टीपू को शिकस्त
देने के बाद बचे हुए राकेट वो अपने साथ इंग्लैंड ले गए जहाँ उन पर शोध किया गया और
यहाँ से दुनिया में राकेट एंड मिसाइल तकनीक की शुरवात हुई |
टीपू की फ़ौज़ में
कुछ छोटी तोपें भी थीं जो एक बाघ की शक्ल में थीं जिसे रॉयल आर्टिलरी म्यूजियम वूलविच
में आज भी देखा जा सकता है | इसमें बाघ अपने पिछले पैरों पर बैठ हुआ है और आगे के दोनों
पैर सीधे हैं और गर्दन उपर की तरफ है | इसे जब चलाते थे तो इसके मुँह से बारूद का गोला
निकल कर दुश्मन के उपर गिरता था | ये तोपें आकार में एक औसत बाघ के बराबर ही थीं चुनांचे इन्हें
एक जगह से दूसरी जगह बहुत आसानी से ले जाया जा सकता था | इसको चलाने वाले सिपाही एक
ख़ास तरह ही पोशाक़ पहनते थे जिस पर बाघ की धारियाँ बनी रहतीं थीं |
टीपू ने ब्रिटिश
ईस्ट इंडिया कंपनी का जमकर मुक़ाबला किया और शुरू की तीन जंगों में अंग्रेजों को करारी
शिक़स्त दी हालाँकि 1799 की चौथी जंग में टीपू की हार हुई और वह मैदान-ए-जंग में लड़ते
हुए शहीद हुआ | गौरतलब हो कि टीपू हिन्दुस्तान की आज़ादी में मैदान-ए-जंग में लड़ते
हुए शहीद होने वाला हिन्दुस्तान का पहला बादशाह था | इस हार के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया
कंपनी की फ़ौज़ ने शहर में जमकर लूटपाट की | इसके बाद कर्नल आर्तर वेल्ज़्ली ने इस
वक़ीये की जाँच करवाई और दोषियों को फाँसी और कोड़ों की सजा दिलवाई | जंग के बाद टीपू
की तमाम दौलत अंग्रेज सिपाहियों के बीच उनके ओहदे के हिसाब से तकसीम की गयी लेकिन टीपू
का मैकेनिकल बाघ लंदन भेज दिया गया | जहाँ इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के नए म्यूजियम में
लोगो को दिखाया गया और इसे लोगों ने ख़ूब पसंद किया | इस म्यूजियम के बंद होने के बाद
इसे साउथ केंसिंग्टन म्यूजियम भेज दिया गया और बाद में इसका नाम बदलकर विक्टोरिया एंड
अल्बर्ट म्यूजियम कर दिया गया | और तब से लेकर ये आम लोगों के देखने लिए म्यूजियम में
आज भी मौज़ूद है |
अंग्रेजों ने भले
ही टीपू को हरा दिया हो लेकिन अपने लिखे दस्तावेजों में वो टीपू को आज भी 'टाइगर ऑफ़
मैसूर' कहकर ही खिताब करते हैं | और ये भी मानते हैं कि टीपू हिन्दुस्तान का एक जांबाज़
जंजू होने के साथ-साथ एक तरक्की पसंद बादशाह भी था |




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