गुरुवार, 16 मार्च 2017



गंगा-जमुनी होली


पूरे देश में होली सिर्फ रंगों का त्यौहार है लेकिन लखनऊ की गंगा-जमुनी होली इससे कहीं ज्यादा है | दरअसल लखनऊ की होली गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक ज़िंदा मिशाल है जिसे हर जाति और मज़हब के लोग मिलकर एक साथ खेलते हैं | नवाब सआदत अली खान से लेकर या मौशिकी पर जान छिडकने वाले अवध के आख़िरी नवाब वाजिद आली शाह तक सब जमकर होली खेला करते थे | शहर का गरीब से गरीब शख्स भी नवाबों के ऊपर रंग फेंक सकता था | नवाबों के दौर में होली का रंग देखते ही बनता था | लखनऊ की इसी गंगा-जमुनी होली को देखकर मेरा जी भी एक शेर कहने को मज़बूर हुआ, मुलाहिजा फरमाएं, “अस्बाब-ए-होली-ए-रंग में ख़ूबाँ ऐसे नज़र आते हैं, किसने-किसको कौन-किसमें रंगा नज़र नहीं आता” |

ख़ुदा-ए-सुखन मोहम्मद तकी उर्फ मीर तकी "मीर" जब दिल्ली से बेजार होकर लखनऊ आये तो वो भी इस शहर की गंगा-जमुनी होली के दीवाने हो गए | उन्होंने तब के नवाब आसफुद्दौला को रंगों में सराबोर होली खेलते देखा तो उनसे रहा न गया और उन्होंने नवाब आसफुद्दौला की होली पर लिखा, "होली खेले आसफुद्दौला वजीर, रंग सौबत से अजब हैं खुर्दोपीर…." |

लखनऊ स्कूल के बड़े उस्तादों में से एक हैदर अली ‘आतिश’ लखनवी साहब भी लखनऊ शहर की होली से मुतासिर हुए बगैर नहीं रह सके और शेर कहते हैं, “होली शहीद-ए-नाज के खूँ से भी खेलिए, रंग इसमें है गुलाल का बू है अबीर की” | लखनऊ के इतिहास में जो शख्स होली के सबसे बड़े दीवाने के तौर पर मशहूर है उसका नाम वाजिद अली शाह के सिवाय भला और क्या हो सकता है और यही नहीं वो शहर की गंगा-जमुनी तहजीब के निगरान भी थे इसीलिए उनका शहर उन्हें जान-ए-आलम कहकर बुलाता था | क़ौमी यकजहती की निशानी के तौर पर लाफ़ानी हो चुके लखनऊ शहर के इस बांके नवाब ने बेशुमार लोक-गीत और होली-गीत लिखे, उनमें से एक से तो आप यक़ीनन ही रूबरू होंगें जिसे फ़िल्म सरदारी बेगम में आशा भोंसले जी ने अपनी आवाज़ से सजाया, “मोरे कान्हा जो आए पलट के, अबके होली मैं खेलूंगी डट के, उनके पीछे मैं चुपके से जा के, ये गुलाल अपने तन से लगा के, रंग दूंगी उन्हें भी लिपट के, अबके होली मैं खेलूंगी डट के….”


जानकार बताते हैं, नवाबों के वक़्त हर फिरके के लोग होली मनाते थे, क्या हिन्दू और क्या मुसलमां, क्या राजा और क्या रंक | सिर्फ़ यही नहीं होली की छाप आज भी मुसलमानों के त्योहारों पर भी साफ़ दिखाई देती है | लखनऊ के मुसलमान होली में तो होली खेलते ही हैं बल्कि मोहर्रम में भी होली खेलते हैं और इसके उलट कई हिन्दू भी मोहर्रम में पूरी सिद्दत से शरीक़ होते हैं | इस तरह का नज़ारा आज भी पुराने लखनऊ में आसानी से देखा जा सकता हैं | ईरानी नव वर्ष नौरोज जो कि होली के ही आस-पास ही पड़ता है, वैसे तो पूरे देश में और देश के बाहर भी मनाया जाता है लेकिन सिर्फ़ लखनऊ में नौरोज के दिन होली की तर्ज पर रंग खेला जाता है | लखनऊ के दिल कहे जाने वाले चौक से होली की बारात नवाबों के वक़्त से आज भी बदस्तूर जारी है जिसमें हर फिरके के लोग शामिल होते हैं | उस दौर में हिन्दू मुसलमां दोनों इकठ्ठे मिलकर होली और मोहर्रम मनाया करते थे और इस बात का पता उस दौर की शायरी से साफ़-साफ़ ज़ाहिर होता है | जहाँ कई हिन्दू शायरों के लिखे मर्सिये आज भी मोहर्रम की मजलिसों की जान हैं वहीं दूसरी तरफ लखनऊ के कई मुस्लिम शायरों ने भी लखनऊ की होली का बयान अपनी शायरी में खूब किया है | महजूर लखनवी साहब लिखते हैं, “गुलज़ार खिले हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो, कपड़ों पर रंग के छीटों से खुशरंग अजब गुलकरी हो…” | 

एक बार का वाकया है, होली और मोहर्रम एक ही रोज़ पड़ गए इसलिए लखनऊ के हिंदुओं ने सामूहिक रूप से फैसला लिया कि वो इस बार होली नहीं खेलेंगे | ये बात जब वाज़िद अली शाह को पता चली तो उन्होंने ऐलान करवाया कि जब हिन्दू भाई मोहर्रम के लिए अपनी दिल-ओ-अज़ीज़ होली को न खेलने का ऐलान कर सकते हैं तो हमारा भी फ़र्ज़ बनता है कि इस बार उनकी होली हर बार से भी ज्यादा हसीन हो | उस दिन होली और मोहर्रम दोनों अलग-अलग वक़्त पर मनाये गए और ख़ुद वाज़िद अली शाह समेत हर फिरके के लोगों ने होली में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया |

होली के दिन नवाब वाज़िद अली शाह पूरी रियाया में मिठाई और ठंडाई बंटवाते थे और हर आम-ओ-ख़ास के साथ जमकर होली खेलते थे | उस दौर की होली गंगा-जमुनी तहज़ीब का एक अटूट हिस्सा थी जो आपसी भाई चारा और मोहब्बत का पैग़ाम थी | जान-ए-आलम का ये शहर आज भी अपनी गंगा-जमुनी विरासत को संजोये हुए है और होली इस विरासत के बीच एक पुल का काम करती रही है क्योंकि रंग तो सबके होते हैं, कोई एक रंग किसी का एक का नहीं होता | गंगा जमुनी-तहज़ीब में नवाबों के समय से ही 'पहले आप-'पहले आप' वाली शैली सराबोर है हालांकि ख़ुदग़र्ज़ आधुनिक शैली की पदचाप भी साफ़ सुनायी देती है लेकिन फिर भी इस शहर की आवाम का एक बड़ा तपका इस तहजीब को संभाले हुए है |

आख़िर में मैं आपको नज़ीर अकबराबादी के इन बेहतरीन मिसरों और गौहर जान के गाये इस होली गीत के साथ छोड़े जाता हूँ और तब तक आप खेलते रहिये अवध की गंगा-जमुनी होली....... आप सभी को होली मुबारक़ हो…… ख़ुश रहिये, आबाद रहिये और सियासतदानों के फरेबों से सतर्क रहिये जिन्होंने इस साझी विरासत का बेडा गर्क कर रक्खा है… J

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की
ख़ुम, शीशे, जाम, झलकते हों तब देख बहारें होली की
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की……….

गौहर जान के बोल - मेरे हज़रात ने मदीने में मनाई होली...  


ये लेख 13 मार्च 2017 को gappagosthi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं | 
http://gappagosthi.com/pages/PC_Ganga_Jamuni_Holi.html

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