यादों के बोसीदा मकाँ से वो भुलाया न जाएगा
अक्सर ऐसा होता है जब हम किसी तथाकथित “बड़े व्यक्ति विशेष” के संपर्क में
आते हैं तो ख़ुद को छोटा महसूस करने लगते हैं | शायद यही वज़ह रही होगी, वसीम बरेलवी
साहब ने ये शेर लिखा,
“आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है, भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है” | ऐसा बहुत कम ही होता है कि हम “बड़े व्यक्ति विशेष”
की संगत में ख़ुद को छोटा महसूस न करें लेकिन उस शाम ऐसा नहीं हुआ |
ये बात है वर्ष 1998 की | मैं और मेरा दोस्त सत्यजीत पहली बार लखनऊ लाँघकर
दिल्ली जा रहे थे | लखनऊ से दिल्ली जाना हमारे लिए बिलकुल ऐसा था जैसे वाज़िद अली
शाह का लखनऊ से जाना हुआ था | पता नहीं क्या बात है लखनऊ शहर की आबोहवा में, एक
अज़ीब सी कशिश है, जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है बयान नहीं…, खैर...अभी ये
मुद्दा नहीं है, बस लखनऊ का ज़िक्र आते ही आदतन यूँ ही हो जाता है |
दिल्ली हम घूमने-वूमने नहीं बल्कि दिल्ली कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग की प्रवेश
परीक्षा देने जा रहे थे | हम पहली बार इतने बड़े शहर जा रहे थे इसलिए थोड़े डरे हुए
भी थे हालांकि दिल्ली में रुकने का इंतज़ाम हमने पहले ही कर लिया था | उस समय हम
लखनऊ यूनिवर्सिटी से स्नातक कर रहे थे और ऑल इंडिया स्टूडेंट फ़ेडरेशन से जुड़े हुए
थे इसलिए दिल्ली के कोटला मार्ग (अब इंद्रजीत गुप्त मार्ग) पर स्थित अजॉय भवन जोकि
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया का दफ़्तर है में रुकने का इंतज़ाम हो गया था |
रात 10 बजे हम लखनऊ मेल में सवार हो गए और क़रीब सुबह 8 बजे हम नई दिल्ली
स्टेशन पहुँच गए | स्टेशन से बाहर निकलकर हमने एक ऑटो वालो को पता दिखाया और वो
चलने को तैयार भी हो गया लेकिन कहने लगा, "बहुत दूर है, सौ रुपये
लगेंगे" शायद उसने हमारा नव-सिखियापन दबोच लिया था | हमारे लाख मोल-भाव करने
पर भी जब वो नहीं माना तो हमने दूसरा ऑटो देखना मुनासिब समझा | लेकिन वो भी सौ
रुपये से कम में जाने को तैयार नहीं हुआ इसलिए मरता-क्या-न-करता हम ऑटो में बैठ गए
और कुछ समय बाद उसने हमें अजॉय भवन के गेट पर उतार दिया |
गेट पर उतरकर हमने ऑटो वाले को रुपये दिए और गेट की तरफ बढ़ लिए जहाँ लाल
शर्ट पहने एक शख़्स तैनात था | हमने उस लाल शर्ट पहने शख़्स को बताया, हम लखनऊ से
आये हैं और साथ लायी चिट्ठी जेब से निकालकर उसे दे दी जो हमें ऑल इंडिया स्टूडेंट
फ़ेडरेशन लखनऊ ने दी थी | उसने चिट्ठी देखने के बाद हमें अंदर आने दिया और बोला,
"अंदर जाकर फलाने कॉमरेड से मिल लो" | हमने भी अपना बैग उठाया और अंदर
जाकर फलाने कॉमरेड से जा मिले और उन्हें चिट्ठी थमा दी | चिट्ठी पढ़ने के बाद
कॉमरेड ने कहा, रूम नंबर 311 में सेट हो जाओ जोकि ईमारत की तीसरी मंज़िल पर था |
हमने उनका शुक्रिया अदा किया और सामान उठाकर सीढ़ियां चढ़ते हुए रूम तक पहुँच गए और
अपना सामान वहीँ पड़े एक बेड पर रख दिया |
हम थोड़ी देर तक आराम करने और फ्रेश होने के बाद दफ़्तर की बनी कैंटीन की तरफ
चल पड़े क्योंकि रात के बाद से कुछ भी नहीं खाया था इसलिए बहुत ज़ोरों की भूँख लगी
हुई थी ऊपर से समय की घड़ी दोपहर के एक भी बजा चुकी थी | लेकिन जब तक हम कैंटीन पहुँचते
तब तक खाना और कैंटीन के नियमानुसार खाना खाने का वक़्त दोनों ख़त्म हो चुका था लिहाज़ा
खाने में केवल ब्रेड और दूध ही उपलब्ध था इसलिए हमने इसी के सहारे पेट में उठे
विद्रोह को कुचल दिया | इसके बाद हम दोनों रूम में वापस आ गए और अपना-अपना बेड पकड़
लिया | इसी बीच कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला और नींद ने हमें अपने गिरफ़्त में ले
लिया | हम क़रीब तीन-चार घंटे तक सोते रहे और लगभग शाम के साढ़े पाँच बजे उठे और
दफ़्तर में बनी लाइब्रेरी का रुख किया जो चौथी मंज़िल पर बनी थी | लाइब्रेरी
साम्यवादी और समाजवादी दस्तावेजों से भरी पड़ी थी | हमने भी एक-दो किताबें उठाई और
कुछ वक़्त के लिए उन्हीं में खो गए |
शाम के आठ बजने को थे | हमारे रात के खाने का वक़्त भी हो चला था और ऊपर से
सुबह आठ बजे हमें श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स प्रवेश परीक्षा देने भी पहुँचना था | लिहाज़ा
हम कैंटीन पहुँचे तो देखा, करीब तीन-चार लोग पहले से खाना खा रहें हैं | हमने भी
एक-एक थाली उठाई और कैंटीन के काउंटर पर रख दी | कैंटीन वाले ने करीब २ मिनट में
हमारी थाली सजा दी | मैं और सत्यजीत दोनों ने थाली उठाई और एक बूढी औरत और एक बूढ़े
आदमीं के बगल में बैठ गए जो पहले से खाना खा रहे थे |
उस दिन खाने में मूँग की दाल, चावल, सब्जी और दही था | मुझे मूँग की दाल बहुत
पसंद नहीं थी लेकिन उससे कोई ख़ास परहेज भी नहीं था लेकिन सत्यजीत को मूँग की दाल बिलकुल
भी पसंद नहीं थी चुनांचे उसने अनायास की कह दिया, “क्या बीमारों वाली दाल बनाई है”
|
ये बात उसके ठीक बगल में बैठी उस मोहतरमा के कानो में भी पड़ी क्योंकि वो सत्यजीत
के बिलकुल बगल में ही बैठी हुई थी हालांकि हमें ये यक़ीन था कि दिखने में सरल और
शांत स्वभाव सी बैठी बूढ़ी मोहतरमा और उस बूढ़े मोहतरम को इसके कोई फ़र्क नहीं पड़ना
चाहिए जबकि ऐसा हुआ नहीं | उस बूढ़े मोहतरम ने तो कुछ नहीं कहा लेकिन उस बूढ़ी मोहतरमा
ने एकदम संजीदा होते हुए कहा, “अगर खाना पसंद नहीं है तो मत खाइये | यहाँ पर जो भी
बनता है सबको वही खाना होता है क्योंकि ये कोई होटल नहीं है” |
हम ऐसा ज़वाब सुनने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थे | सत्यजीत उस बूढ़ी मोहतरमा
की बात सुनकर शांत हो गया | हम दोनों ने जो बना था जैसा बना था खा लिया और अपने-अपने
बर्तन साफ़ कर उसको उसकी तय जगह पर रख दिया क्योंकि वहाँ का वही कायदा था ऐसा हमें
लखनऊ में ही चिट्ठी देते समय बता दिया गया था |
खाने के बाद हम ये जानना चाहते थे कि वो बूढ़ी मोहतरमा कौन है हालांकि उस
बूढ़े मोहतरम को मैं पहचानता था, वो थे कॉमरेड ए.बी बर्धन जो अब हमारे बीच नहीं हैं
| उस बूढ़ी मोहतरमा के साथ-साथ ए.बी बर्धन ने भी अपने बर्तन साफ़ किये और तय जगह पर
रख दिया और वहाँ से चले गए | उनके जाने के बाद हमने उस कैंटीन वाले से पूछा, “वो
बूढ़ी मोहतरमा कौन है” ? उसने उस बूढ़ी मोहतरमा का नाम कॉमरेड गीता मुखर्जी बताया |
हमारे और पूछने पर उसने बताया कि ये पांसकुड़ा, पश्चिम बंगाल से सांसंद हैं |
इसके पहले तक हम केवल ये जानना चाहते थे कि आख़िर ये मोहतरमा कौन हैं
जिन्होंने इतनी बेरूख़ी के साथ हमारी बोलती बंद कर दी लेकिन ये जानने के बाद कि वो
सांसद है और इसके बावज़ूद भी वो कैंटीन तक खाने ख़ुद आयी और उन्होंने वही खाया जो
हमने खाया | यही नहीं अपने बर्तन भी ख़ुद साफ़ किये | हमारे लिए ये कोई छोटी बात
नहीं थी क्योंकि हमने अपने आस-पास छोट-भइये स्वयंभू टाइप तक को रौब झाड़ते देखा था
और इस कदर कि सादगी तो केवल किताबों में ही पढ़ी थी लेकिन रूबरू नहीं देखी थी |
यहाँ तक हम सोच भी नहीं सकते थे कि किसी पार्टी का सांसद और महासचिव इस कदर साधारण
होगा, न लाव-लश्कर और न चेले-चपाटों की पलटन | अब हमारे मन में उनके बारे में
जानने के लिए कौतूहल और भी तेज़ हो गया था लेकिन अगले दिन हमें सुबह ही उठना था
इसलिए अपने अंदर उठने वाले कौतूहल को अपने ज़हन के एक कोने में कुछ दिनों के लिए
कैद कर लिया |
8 जनवरी 1924 को कलकत्ता में जन्मीं गीता मुखर्जी पहली बार 1980 में सातवीं
लोकसभा के लिए चुनी गयीं हालांकि इससे पहले वो दो बार की पश्चिम बंगाल में विधायक
भी रहीं | वो अपना चुनाव कभी नहीं हारीं | लोग प्यार से उन्हें गीता दी के नाम से भी
पुकारते थे | वो एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानीं होने के साथ-साथ एक जुझारू
राजनितिक कार्यकर्ता, एक समाज सुधारक, एक आंदोलनकारी, किसानों-मज़दूरों की बार करने
वाली, महिला सशक्तिकरण के लड़ने वाली और एक लेखिका भी थीं और इसी के चलते उन्हें कई
बार जेल भी जाना पड़ा था | उन्होंने बांगला भाषा में बच्चों के लिए कुछ किताबें भी
लिखीं थीं |
हमने उनके बारे में और अधिक जानने की बहुत कोशिश की लेकिन कुछ ज्यादा हाँथ
नहीं लगा | शायद लाज़मीं ही था इतनी सरल और साफ़ छवि के नेता को कौन याद रखता है और
कौन लिखता है | इस बात पर मुझे जगदंबा प्रसाद मिश्र हितैषी का ये शेर याद आता है,
"शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी
निशां होगा" |
वो जब तक ज़िंदा रहीं (बारहवीं लोकसभा) तब तक लोकसभा की सांसंद रहीं | 4
मार्च 2000 को गीता मुखर्जी का दिल का दौर पड़ने से निधन हो गया और देश ने महिलाओं,
बच्चों और नवजवानों की बात करने वाली एक समाज सुधारक नेतृत्व को खो दिया | ये एक ऐसा
नुकसान था जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती |
खैर...हमें उनकी वो डांट अब बहुत अच्छी लग रही थी और उस दिन के बाद से हमें
जो और जैसा खाने को मिलता है खा लेते हैं और जब कुछ पसंद नहीं आता तो गीता दी याद आ
जातीं हैं जिसके बाद वो चीज़ मुझे और भी लज़ीज लगने लगती हैं |
ये लेख 04 मार्च 2017 को gappagosthi.com पर प्रकाशित हुआ था | इसे आप नीचे दिए गए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं |
http://gappagosthi.com/pages/YKB_yaddon_ki_Besida.html

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